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सुप्रीम कोर्ट में विधायी बहुमत और राजनीतिक बहुमत की बात

महाराष्ट्र में शिवसेना विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी आने वाले भविष्य में एक बड़ी लकीर साबित होने जा रही है। दरअसल खेमा बदल और दूसरे दलों में शामिल होने की निरंतर बढ़ती प्रवृत्ति के पीछे का असली मकसद देश की जनता अच्छी तरह समझती है।

दरअसल जिस मकसद से दल बदल कानून को लाया गया था, राजनीतिक निहितार्थ ने उसमें भी छेद खोज लिये हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का यह कहना कि विधायी नहीं राजनीतिक बहुत साबित कीजिए, सिर्फ महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे खेमा के लिए ही यह बड़ा सवाल नहीं रह गया है।

दरअसल महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के धड़े ने शिवसेना पार्टी पर अपना अधिकार जताते हुए कहा कि एक विधायक दल राजनीतिक दल से अभिन्न और संगठित रूप से जुड़ा होता है। शिंदे गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एनके कौल ने पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ को बताया कि प्रतिद्वंद्वी नेताओं का अब मंत्रालय में विश्वास नहीं रह गया है।

मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़, जस्टिस एमआर शाह, कृष्ण मुरारी, हिमा कोहली और पीएस नरसिम्हा की पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ महाराष्ट्र राजनीतिक संकट से जुड़े मुद्दे पर सुनवाई कर रही थी।

न्यायमूर्ति नरसिम्हा, जो खंडपीठ का हिस्सा थे, ने शिंदे खेमे से यह दिखाने के लिए कहा कि उनके पास राजनीतिक बहुमत है न कि विधायी बहुमत। वरिष्ठ अधिवक्ता एनके कौल ने अदालत को जवाब दिया कि वह इस मुद्दे को बुधवार को संबोधित करेंगे।

अदालत ने विभिन्न मुद्दों, विभिन्न निर्णयों पर कानूनी पहलुओं पर शिंदे खेमे से कई सवाल भी पूछे और यह जानने की कोशिश की कि दलबदल और फ्लोर टेस्ट को कैसे अलग किया जाए।

मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने यह भी टिप्पणी की कि यदि फ्लोर टेस्ट का पूर्ववर्ती कारण दसवीं अनुसूची के उल्लंघन पर आधारित है, तो उस स्तर पर फ्लोर टेस्ट आयोजित करना दसवीं अनुसूची के पूरे आधार और उद्देश्य को विफल कर देगा। अदालत ने यह भी जानना चाहा कि क्या वे एक दलबदल को वैध बना रहे हैं जो अन्यथा दसवीं अनुसूची के तहत स्वीकार्य नहीं है।

अधिवक्ता ने जवाब दिया कि उनका मामला दसवीं अनुसूची के तहत विभाजन का मामला नहीं है, वे एक पार्टी के भीतर एक प्रतिद्वंद्वी गुट के बारे में बात कर रहे हैं जो कि असहमति है और एक पार्टी के भीतर लोकतंत्र का सार है और उनका दावा है कि उनका शिविर ही असली शिवसेना है।

सुनवाई के दौरान, अदालत ने कहा कि शक्ति परीक्षण की आवश्यकता वाली समस्या एक कथित दलबदल है और कहा कि समस्या इसलिए उत्पन्न होती है क्योंकि विश्वास मत अयोग्यता की कार्यवाही से आंतरिक रूप से जुड़ा हुआ है।

वरिष्ठ अधिवक्ता कौल ने कहा कि यह आंतरिक असंतोष का मामला है और शिंदे समूह शिवसेना का प्रतिनिधित्व करने वाला गुट है, जिसका फैसला भारत निर्वाचन आयोग कर सकता है। कौल ने कहा कि जहां तक शक्ति परीक्षण का सवाल है, यह केवल इस बात से जुड़ा है कि मुख्यमंत्री में विश्वास है या नहीं।

अदालत ने यह भी कहा कि राजनीतिक दल के प्रमुख ने राज्यपाल को सूचित नहीं किया कि वे महा विकास अघाड़ी (एमवीए) के गठबंधन से हट रहे हैं। कौल ने जवाब दिया कि 55 में से 34 ने राज्यपाल को पत्र लिखकर कहा है कि उन्हें इस सरकार पर भरोसा नहीं है। उद्धव ठाकरे गुट ने पहले प्रस्तुत किया था कि विपरीत खेमे के पास दसवीं अनुसूची के तहत कोई बचाव नहीं है।

पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ महाराष्ट्र राजनीतिक संकट के संबंध में प्रतिद्वंद्वी गुटों उद्धव ठाकरे और मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे द्वारा दायर याचिकाओं के एक बैच की सुनवाई कर रही थी।

सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने पहले कहा था कि वह अयोग्यता याचिकाओं से निपटने के लिए विधानसभा अध्यक्षों की शक्तियों पर 2016 के नबाम रेबिया के फैसले पर पुनर्विचार के लिए महाराष्ट्र राजनीतिक संकट से संबंधित मामलों को सात-न्यायाधीशों की एक बड़ी बेंच को भेजने पर बाद में फैसला करेगी।

अदालत में इस विषय पर विचार होने के साथ साथ यह सवाल खड़ा हो रहा है कि भारतीय जनता पार्टी की वाशिंग मशीन तकनीक क्या भारतीय राजनीति को प्रभावित कर रही है। कांग्रेस के नेता शशि थरूर ने इस बारे में एक सूची जारी की है और कहा है कि यह वैसे नेता हैं, जिनके खिलाफ जांच चल रही थी और उनके भाजपा में शामिल होते ही जांच बंद कर दी गयी।

दूसरी तरफ जिन नेताओं ने वर्तमान केंद्र सरकार के खिलाफ हथियार डालना स्वीकार नहीं किया, उन्हें केंद्रीय एजेंसियों के जांच के घेरे में डाला गया। दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया की गिरफ्तारी से उठ रहे सवालों के बीच अदालत की यह टिप्पणी और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि खुद श्री सिसोदिया ने अपने त्यागपत्र में यह साफ साफ लिखा है कि उनपर इस बात के लिए दबाव डाला गया कि वह अरविंद केजरीवाल को छोड़ दें। लिहाजा महाराष्ट्र में भी यह सवाल अदालत की सोच में शामिल रहेगा।