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हेमंत सोरेन सरकार के लिए भी खतरा बन सकती है गुटबाजी

  • पहले से ही कई विधायक नाराज

  • डॉ उरांव के समर्थक दरकिनार

  • आरपीएन सिंह का असर जारी

राष्ट्रीय खबर

रांचीः कांग्रेस के अंदर गुटबाजी अब भी जारी है। अनेक बड़े नेताओं ने इसी वजह से अब कांग्रेस कार्यालय से ही किनारा कर लिया है। इससे पहले जब डॉ रामेश्वर उरांव प्रदेश अध्यक्ष हुआ करते थे तो नियमित तौर पर वहां कांग्रेस के सांसद, विधायक और मंत्री भी नियमित आया करते थे।

अब राजेश ठाकुर को प्रदेश अध्यक्ष बनाये जाने के बाद यह सिलसिला लगभग बंद हो चुका है। कार्यक्रमों में ही सिर्फ बड़े नेताओँ की उपस्थिति नजर आती है।

आरपीएन सिंह के प्रवल प्रतापी होने के दौरान कांग्रेस के अनेक कार्यकर्ता उनके फैसलों और बोलचाल से नाराज हुए थे। विधानसभा चुनाव के वक्त से ही यह अंदरखाने से आवाज आने लगी थी कि दरअसल आरपीएन सिंह भाजपा को फायदा पहुंचाने के लिए प्रत्याशियों के चयन में अपना खेल कर रहे हैं।

बाद में उनके भाजपा में शामिल होने के बाद भी प्रदेश अध्यक्ष पर से उनके नाम का प्रभाव खत्म नहीं हुआ है। इसी वजह से कई बार प्रदेश अध्यक्ष को बदलने की मांग भी हो चुकी है।

वर्तमान अध्यक्ष ने हाल ही में डॉ राजेश गुप्ता, किशोर शाहदेव और आलोक दुबे को पार्टी से निष्कासित कर दिया है। इस वजह से यह गुटबाजी अब विवाद के तौर पर स्थापित हो चुकी है।

इस विवाद में हेमंत सोरेन की सरकार की सेहत पर कोई आंच नहीं है, ऐसा सोचना गलत होगा। पहले से ही इस बात की चर्चा है कि कांग्रेस के कई महिला विधायकों सहित कई एमएलए पहले से ही नाराज चल रहे हैं। दूसरी तरफ डॉ रामेश्वर उरांव ने खुद को पूरी तरह अलग कर रखा है।

इसके बीच अगर कांग्रेस का विवाद किसी समझौते तक नहीं पहुंचा तो रामगढ़ विधानसभा के उपचुनाव के बाद इसके परिणाम दिखने लगेंगे। वैसे स्थिति में पार्टी के अंदर की राजनीति से सरकार की सेहत पर भी असर पड़ेगा क्योंकि स्पष्ट बहुमत में होने के बाद भी हेमंत सोरेन खुद प्रत्यक्ष तौर पर कांग्रेस की राजनीति में वह दखल नहीं रखते, जिससे विवाद सुलझ सके। इसके बीच एक उम्मीद की किरण लालू प्रसाद का सिंगापुर से वापस लौट आना है। श्री प्रसाद एकमात्र ऐसे नेता हैं, जिनकी बात का वजन बिहार के अलावा झारखंड में भी समान रुप से होता है।

हाल ही में तेजस्वी यादव भी हेमंत सोरेन से मिलकर गये हैं। फिर भी कांग्रेस के इस आंतरिक विवाद को दिल्ली के हस्तक्षेप के बिना सुलझाना फिलहाल संभव नहीं है। दूसरी तरफ भाजपा पहले से ही सरकार से नाराज चल रहे विधायकों को कड़ी नजर रखे हुए हैं। ऐसे में आक्रोशित विधायकों का दूसरे खेमे में चले जाना ही हेमंत सोरेन की सरकार के लिए परेशानी का सबब बन सकता है।