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मोदी सरकार और गौतम अडाणी दोनों परेशानी में

अमेरिकी संस्था की रिपोर्ट और अडाणी समूह को दी गयी चुनौतियों की वजह से अब गौतम अडाणी के साथ साथ नरेंद्र मोदी की साख भी दांव पर लग चुकी है। ऐसे में यह सवाल उभर रहा है कि अपनी छवि को लेकर बेहद सतर्क रहने वाले नरेंद्र मोदी आगे क्या करेंगे।

सरकारी एजेंसियों के द्वारा जांच प्रारंभ किये जाते ही वे सारे तथ्य सामने आने लगे हैं, जिनकी चर्चा पूर्व में भी की गयी थी। उस वक्त सरकार की मेहरबानी की वजह से अडाणी को इनसे कोई परेशानी नहीं हुई थी। अब हिंडेनबर्ग नामक संस्था की रिपोर्ट का खंडन करते ही इस संस्था ने अडाणी समूह को चुनौती दे दी है।

संस्था का दावा है कि उनलोगों ने लगातार दो साल तक सारे तथ्यों की जांच पड़ताल के बाद ही अपनी रिपोर्ट जारी की है। संस्था ने यह भी कहा है कि इधर उधर की बात कहने से बेहतर है कि कंपनी उन सवालों का सीधा उत्तर दे, जो उनके काफी समय पहले पूछे गये थे।

अब अमेरिकी संस्था की इस रिपोर्ट के सार्वजनिक होते ही अडाणी समूह के साथ साथ कई सरकारी बैंक और एलआईसी भी संकट से घिर गयी है। सरकार की कृपा पात्र इस औद्योगिक घरानों पर बैंकों और भारतीय जीवन बीमा निगम से खुलकर पैसे लूटाये थे।

अब बाजार में अडाणी के शेयरों का भाव गिर जाने की वजह से उन्हें भी जबर्दस्त आर्थिक नुकसान हुआ है। अमेरिकी कंपनी की रिपोर्ट आने के तुरंत बाद शेयर बाजार पर इसका असर देखा गया था। अडाणी समूह के शेयरों के भाव गिरने लगे थे।

शुक्रवार तक शेयर के भाव इस कदर नीचे गिरे कि कंपनी को काफी आर्थिक नुकसान हो गया। लेकिन असली सवाल उस रिपोर्ट में उल्लेखित इस तथ्य का है कि अडाणी समूह ने अपनी संपत्ति को बढ़ा चढ़ाकर दिखाया है जबकि असलियत कुछ और ही है।

वैसे अडाणी की कंपनियों के शेयरों में जिन कंपनियों का बड़ा पूंजीनिवेश हैं, उनमें बैंक और एलआईसी है। तो जाहिर है कि शेयर के भाव गिरने से उन्हें भी नुकसान हो रहा है जो दरअसल देश का नुकसान है। अब सेबी द्वारा इस मामले की छानबीन का एलान भी बदलते समीकरणों का संकेत देता है।

वैसे बता दें कि शेयर बाजार पर ऐसा हमला पहले विदेशी निवेशकों न धीरूभाई अंबानी की कंपनी पर भी किया था। लेकिन धीरू भाई अंबानी ने उसका ऐसा मुंहतोड़ जबाव दिया था कि विदेशी निवेशको मैदान छोड़ गये थे। इसलिए एक संभावना यह है कि गौतम अडाणी भी ऐसा जबावी हमला करें लेकिन उसके लिए यह तय होना जरूरी है कि वाकई अडाणी समूह ने अपनी संपत्ति के मूल्यांकन में गड़बड़ी नहीं की है।

अब अडानी एंटरप्राइजेज का शेयर मूल्य अपने न्यूनतम आईपीओ से नीचे गिर गया है, पिछले मंगलवार तक उस मूल्य पर कारोबार कर रहा था। अडानी स्थिति से उबरने के लिए शेयरों की आस्किंग प्राइस को कम कर सकते थे, यानी सबसे कम कीमत जिस पर उन्हें बेचा जा सकता था (ऐसे मामलों में जहां 20 प्रतिशत तक की छूट संभव थी)। लेकिन वह भी अगले सप्ताह शेयर की कीमत को गिरने से नहीं रोक सका।

समस्याएँ किसी न किसी रूप में उत्पन्न होंगी। दुनिया के सबसे धनी व्यक्तियों में से एक अडानी की विडंबना जैसे ही इसमें स्पष्ट हुई, इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव भविष्य में उनकी कंपनी के अलावा बड़े शेयर बाजार पर भी पड़ सकता है। अंबानी की तब की स्थिति और आज अदानी की स्थिति में अंतर है।

पिछले कुछ वर्षों में असाधारण तेजी के बाद अडानी के शेयर की कीमत महीनों से नीचे की ओर चल रही है। 2022 में समूह की कंपनियों के शेयरों ने विभिन्न क्षेत्रों में लगभग शीर्ष को छू लिया। तब से, लगभग 35 प्रतिशत की गिरावट ध्यान देने योग्य हो गई है, कभी-कभी यह 45 प्रतिशत तक पहुंच जाती है।

शुक्रवार को सबसे ज्यादा घाटा हुआ है। एकमात्र समस्या यह है कि इस व्यापारी समूह की गतिविधियों के बारे में कहने के लिए कुछ नहीं है। अडानी एंटरप्राइजेज ने अपेक्षाकृत कमजोर स्थितियों के लगातार 3 वर्षों के बाद 2021-22 में 75 प्रतिशत की राजस्व वृद्धि देखी।

लेकिन उस वर्ष इसका सकल लाभ गिरकर कुल बिक्री का 1.5 प्रतिशत रह गया। समूह की 7 सूचीबद्ध कंपनियों में से सभी 6 ने मार्च 2022 तक अपने पूर्व-कर लाभांश में मामूली कमी दिखाई। एकमात्र अपवाद अडानी पावर था, जो राजस्व में मामूली वृद्धि के साथ 187 प्रतिशत से अधिक का लाभ लेने में कामयाब रहा।

असाधारण विकास क्षमता वाली छोटी स्टार्ट-अप कंपनियों के लिए आसमान छूते मुनाफे को समझा जा सकता है। लेकिन यह पूंजी-गहन बुनियादी ढांचे वाली कंपनियों के मामले में समझ में नहीं आता है। आखिरी बार इस तरह का मूल्यांकन 2008 में देखा गया था, जब अनिल अंबानी की रिलायंस पावर पर शेयरों को बढ़ी हुई कीमतों पर बेचने का आरोप लगाया गया था। परिणाम क्या हुआ सब जानते हैं।