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जनसंख्या बढ़ोत्तरी भी भविष्य में भारतीय मुद्दा

दुनिया की आबादी अब आठ सौ करोड़ से अधिक हो चुकी है। गत 15 नवंबर को एक बच्ची को दुनिया के आठ सौंवे करोड़ का शिशु माना गया। इसे लेकर जितना उत्साह है उससे कम चिंता अर्थशास्त्रियों को नहीं है। निरंतर बढ़ती आबादी में घटते संशाधन इस दुनिया को एक असंतुलन की तरफ ले जा रहे हैं, जिसके खतरनाक परिणाम हो सकते हैं।

दुनिया का इतिहास गवाह है कि संसाधनों के कमी की वजह से कई हिंसक क्रांतियों का जन्म हुआ है। भारत के लिए यह अधिक चिंता का विषय है। भारत की चुनौतियां विकसित देशों की तुलना में अधिक है क्योंकि भारत विकास करना चाहता है। दुनिया के अनेक देश ऐसे भी हैं, जहां सिर्फ इसी वजह विकास होना तो दूर वे गरीबी में उलझते चले जा रहे हैं।

अब इस खतरे को समझने के पहले इंसान के क्रमिक विकास को भी समझना जरूरी है। वैज्ञानिक अनुमान के मुताबिक इंसान को बनने में करीब 1 अरब होने में 1 लाख 99 हजार 800 साल लग गए थे। फिर इसके बाद इतनी तेज रफ्तार से बढ़े कि सिर्फ 222 साल में 1 अरब से 8 अरब हो गए। आखिरी 100 करोड़ लोग तो महज 11 साल में बढ़ गए हैं।

करीब एक लाख साल पहले होमो सेपियन्स अफ्रीका से निकलकर यूरोप और एशिया के कुछ हिस्सों में पहुंचे। करीब 35 से 65 हजार साल पहले ऑस्ट्रेलिया की तरफ रुख किया। करीब 25 लाख साल पहले प्लेइस्टोसिन यानी आइस एज की शुरुआत हुई थी। इस दौरान पृथ्वी का लगभग 205 लाख स्क्वॉयर किमी हिस्सा बर्फ से ढका था। इस दौरान प्राकृतिक रूप से पुल तैयार हुए जो एशिया को अमेरिका (अलास्का) से जोड़ते थे। वैज्ञानिकों के मुताबिक होमोसेपियंस इसी के सहारे एक जगह से दूसरी जगह गए होंगे।

दुनिया का शीत काल करीब 11 हजार साल पहले समाप्त हुआ। तब तक इस बर्फ का बहुत बढ़ा हिस्सा पिघल गया, जिसके चलते पृथ्वी कई द्वीपों में बंट गई। समय के साथ जैसे-जैसे इंसान की सोच विकसित हुई, उसने खेती शुरू की। अपनी जरूरतों के आधार पर नए अविष्कार किए। खानाबदोश ये इंसान अब अपने-अपने इलाके विकसित करने लगे थे। इसके साथ वो परिवार भी बसाने लगे थे।

आबादी में तेजी आयी। साल 1800 के बाद, जब इंसानों की लाइफ एक्सनपेक्टें सी यानी जीवन जीने की औसत उम्र में बढ़ोत्तरी होने लगी। आज से 252 साल पहले तक आदमी की औसत उम्र सिर्फ 28 साल थी। 1955 में लाइफ एक्स्पेक्टें सी रेट 40 साल थी, जो आज बढ़कर 73 साल हो गई है।

अब भारत की चुनौती यह है कि वैज्ञानिक गणना के मुताबिक वह शीघ्र ही चीन को भी आबादी में पीछे छोड़ देगा और अब तक भारत की जनसंख्या वृद्धि के दर में कोई ऋणात्मक परिवर्तन नहीं देखा गया है। दूसरी तरफ चीन में जन्मदर घट गया है। सीमित संसाधनों की वजह से अधिक आबादी के बीच उनका बंटवारा कठिन काम होता है। लोग अधिक हों तो हरेक के हिस्से में कम ही आता है। यह चुनौती अनाज यानी भोजन के मामले में सबसे बड़ी चुनौती है।

हम जिस तेजी से अपने अनाज उत्पादन को बढ़ा रहे हैं, उसपर अब मौसम के बदलाव की मार दिखने लगी है। ऐसे में हर व्यक्ति के लिए भोजन जुटाना कोई आसान काम नहीं है। दूसरी तरफ कोरोना महामारी ने भी आर्थिक संतुलन को बिगाड़कर रख दिया है। जिसके पास बहुत अधिक पैसा था वह तो इस झटके को झेल गया है लेकिन जिनके पास सीमित आर्थिक संसाधन थे, वे अब धन की कमी को हर पल महसूस कर रहे हैं। इससे भी एक परेशानी पैदा हो रही है।

भारतीय अर्थव्यवस्था चूंकि बचत आधारित है इसलिए जब लोगों के पास पैसा कम हो गया है तो उस बचत भंडार को सबसे पहले पूरा करने की चुनौती के कारण बाजार में भी नकदी का प्रवाह उस तेजी से नहीं हो रहा है, जिसकी जरूरत है। इसलिए दुनिया भले ही आठ सौ करोड़ वें बच्चे के जन्म को लेकर आनंदित हो भारत को यह सोचना चाहिए कि दुनिया की सबसे अधिक आबादी उसके पास होने के बाद वह सभी के लिए समान संसाधन और अवसर कैसे पैदा कर पायेगा।

यह समझ लेना जरूरी है कि भौगोलिक क्षेत्रफल के लिहाज से हम चीन से कम इलाके में है। ऐसे में हर इलाके में भी जनसंख्या विस्फोट का यह दबाव बढ़ेगा। दूसरी तरफ पर्यावरण को सुरक्षित और संरक्षित रखने के लिए जंगल यानी वन को और बेहतर बनाने की भी जरूरत है। दोनों के बीच ऐसा संतुलन कायम करना कोई आसान काम नहीं है। इसलिए भारत को भी अपनी बढ़ती आबादी को हर तरह के संसाधन उपलब्ध कराने अथवा जनसंख्या नियंत्रित करने की दिशा में ठोस कदम उठाना चाहिए। यदि ऐसा नहीं हुआ तो तय है कि भूख और भरे पेट के बीच की जंग में यह देश फिर से जलेगा।