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गुजरात में आदिवासी कार्ड के लिए भाजपा की तरफ से द्रोपदी मुर्मू की चर्चा

  • अनेक सीटों पर आदिवासी वोट निर्णायक

  • इस बार का चुनाव पहले से कठिन है

  • परिणाम बदला तो बहुत कुछ बदलेगा

राष्ट्रीय खबर

अहमदाबादः गुजरात के आदिवासियों को अपने पाले में रखने के लिए भाजपा को पूरी ताकत लगाना पड़ रहा है। इसी काम में अब देश के प्रथम नागरिक द्रोपदी मुर्मू की चर्चा वहां के चुनाव में हो रही है। दरअसल राष्ट्रपति पद के चुनाव के वक्त विरोधी खेमा ने जब यशवंत सिन्हा जैसे कद्दावर शख्स को सामने उतारा तो अचानक से भाजपा ने द्रोपदी मुर्मू को आगे कर विरोधियों में फूट डाल दी थी। इसी वजह से अनेक भाजपा विरोधी दलों ने यशवंत सिन्हा का साथ नहीं दिया था।
अब गुजरात चुनाव में आदिवासियों की ताकत को समझते हुए भाजपा ने फिर से उनका नाम आगे किया है। इसमें दावा किया जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी ने ही किसी आदिवासी को पहली बार देश का राष्ट्रपति बनाया है। इसलिए भाजपा के विकास के एजेंडे में आदिवासी शीर्ष स्थान पर हैं।
जानकार मानते हैं कि गुजरात से ही द्रोपदी मुर्मू के नाम की बार बार चर्चा का लक्ष्य सिर्फ गुजरात ही नहीं है। भाजपा अभी से ही दो साल बाद होने वाले लोकसभा चुनाव पर भी ध्यान दे रही है। आंकड़े समझ लें तो गुजरात में करीब पंद्रह प्रतिशत आदिवासियों की आबादी है। इसमें कांग्रेस की पैठ को कम करने में भाजपा को काफी समय तक लगातार प्रयास करना पड़ा है। इस बार कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने अपने अपने घोषणा पत्र में आदिवासियों का खास उल्लेख कर भाजपा की चुनौती को बढ़ा रखा है। यहां के आदिवासी इलाकों में कांग्रेस को कमजोर करने के क्रम में 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने करीब 52 प्रतिशत आदिवासी वोट पाये थे। दूसरी तरफ कांग्रेस की झोली में मात्र 38 प्रतिशत आदिवासी वोट गये थे।
राष्ट्रीय स्तर पर विचार करें तो देश की कुल आदिवासियों की आबादी का बीस प्रतिशत गुजरात में है। राजस्थान और महाराष्ट्र की सीमा के करीब राज्य के भील आदिवासियों का इलाका है। राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा का प्रभाव इन इलाको में भाजपा अच्छी तरह महसूस कर रही है। राज्य में 37 सीटें आदिवासियों के लिए सुरक्षित है जबकि 47 सीटें ऐसी हैं जहां आदिवासियों का वोट निर्णायक भी हो सकता है। इसके अलावा चालीस सीटों पर बीस प्रतिशत और 31 सीटें पर 30 प्रतिशत से अधिक आदिवासी मतदाता हैं।
लगातार 27 वर्षों तक गुजरात का शासन भाजपा के पास होने की वजह से स्वाभाविक तौर पर सत्ता विरोधी सोच बढ़ी है। इस बार के चुनाव में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के चुनाव प्रचार ने भी भाजपा के लिए कड़ी चुनौती पेश कर दी है। इसलिए नरेंद्र मोदी और अमित शाह का गढ़ बताकर प्रचार किये गये इस राज्य में अपनी सत्ता को कायम रखना भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
ऐसा इसलिए भी है क्योंकि अगर भाजपा के हाथ से गुजरात निकला तो पार्टी के अंदर नेतृत्व परिवर्तन की मांग के अलावा दूसरे राज्यों में भी भाजपा विरोधी माहौल बनना प्रारंभ हो जाएगा। इसलिए अब भाजपा की तरफ से यहां होने वाले चुनाव प्रचार में भाजपा के द्वारा आदिवासियो को दिये गये सम्मान के लिए द्रोपदी मुर्मू के नाम की चर्चा होने लगी है।