छात्र आंदोलन की तेज लहर ने ढाल दिया अभेद्य किला
काफी समय से जारी था आंदोलन
चौदह साल के एकछत्र शासन का अंत
जनता के भड़कने से कुर्सी चली गयी
बेलग्रेडः सर्बिया की राजनीति पर बीते 14 से अधिक वर्षों से एकछत्र राज करने वाले राष्ट्रपति एलेक्जेंडर वुसिक के प्रभुत्व का अंत हो गया है। रविवार को हुए मध्यावधि संसदीय चुनाव में रिकॉर्ड मतदान के बाद वुसिक ने अपनी हार स्वीकार कर ली। 1990 के दशक के खूनी युद्ध और अंतरराष्ट्रीय अलगाव झेल चुके देश में समर्थकों के लिए 56 वर्षीय वुसिक स्थिरता, विकास और देशभक्ति के प्रतीक थे। वहीं, विरोधियों के लिए वे एक निरंकुश नेता थे, जिन्होंने सरकार में भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया और मास्को व ब्रसेल्स के बीच दोहरी नीति अपनाई। बेलग्रेड स्थित पार्टी मुख्यालय से समर्थकों को संबोधित करते हुए वुसिक ने स्पष्ट किया कि आंकड़ों के आधार पर वे यह चुनाव हार चुके हैं।
वुसिक का राजनीतिक सफर 1990 के दशक में स्लोबोदान मिलोसेविच के उग्र-राष्ट्रवादी सहयोगी और सूचना मंत्री के रूप में शुरू हुआ था। मिलोसेविच के पतन के बाद वे सुदूर-दक्षिणपंथी सर्बियन रेडिकल पार्टी के वरिष्ठ नेता बने। हालाँकि, 2008 में उन्होंने अपनी छवि बदलते हुए प्रो-यूरोपीय सर्बियन प्रोग्रेसिव पार्टी की स्थापना की। 2012 से देश की राजनीति पर हावी रही इस पार्टी के माध्यम से वे रक्षा मंत्री, प्रधानमंत्री और 2017 में राष्ट्रपति के पद तक पहुँचे। अपनी नई छवि के बावजूद, वे कट्टर राष्ट्रवादी तत्वों से दूरी बनाने और 1990 के युद्ध अपराधों के आरोपियों की निंदा करने से हमेशा कतराते रहे।
वुसिक ने खुद को एक अनथक नेता के रूप में पेश किया, जिन्होंने सर्बिया में भारी विदेशी निवेश आकर्षित किया और रोजगार के अवसर पैदा किए। उन्होंने एक ओर यूरोपीय संघ में शामिल होने की आकांक्षा रखी, तो दूसरी ओर रूस के साथ सर्बिया के संबंधों को मजबूती से बनाए रखा। देश के बुनियादी ढांचे में सुधार को अपनी मुख्य उपलब्धि बताते हुए उन्होंने सर्बिया को क्रेन की भूमि (निर्माण का केंद्र) बनाने का वादा किया था। एक्सपो 2027 की तैयारियाँ और राजधानी में लगे उनकी पार्टी के पोस्टर इसी का हिस्सा थे। हालाँकि, वर्ष 2024 में एक नवनिर्मित रेलवे स्टेशन की कंक्रीट छत गिरने से हुई 16 लोगों की मौत ने पासा पलट दिया। इस हादसे ने निर्माण परियोजनाओं में जारी भ्रष्टाचार के खिलाफ जन-आक्रोश को भड़का दिया। इसके बाद छात्रों के नेतृत्व में व्यापक विरोध प्रदर्शन शुरू हुए। मिलोसेविच के दौर के बाद यह देश का सबसे बड़ा जन-आंदोलन था, जिसने आखिरकार वुसिक को मध्यावधि चुनाव कराने पर मजबूर किया और उनके शासन को उखाड़ फेंका।