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जस्टिस शर्मा ने पुत्र का चुनाव आयोग से संबंध छिपाये

मुख्य चुनाव आयुक्त मामले की सुनवाई में एक और गड़बड़ी

बेटा चुनाव आयोग का वकील है

नियमतः इसकी जानकारी देनी थी

अब बड़ी बेंच में फिर होगी सुनवाई

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति मामले में दो-न्यायाधीशों की खंडपीठ के विभाजित फैसले (स्प्लिट वर्डिक्ट) को वापस लेने के लिए एक आवेदन दायर किया गया है। याचिकाकर्ता का दावा है कि पीठ का हिस्सा रहे न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा ने अपने बेटे के चुनाव आयोग के साथ पेशेवर जुड़ाव का खुलासा नहीं किया था।

याचिकाकर्ता नमन श्रेष्ठ द्वारा दायर आवेदन में कहा गया है कि न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा के बेटे के मध्य प्रदेश हाईकोर्ट मंस ईसीआई के स्थायी वकील के रूप में कार्यरत होने की बात मामले की पांचों सुनवाइयों के दौरान किसी भी समय पक्षों के सामने प्रकट नहीं की गई थी। याचिका में कहा गया है कि यदि इस बात की जानकारी पहले होती, तो आवेदक जज से खुद को मामले से अलग (रिक्यूज़) करने का अनुरोध करते। खुलासे के अभाव में उन्हें विभाजित फैसला सुनाए जाने से पहले ऐसा अनुरोध करने का अवसर नहीं मिल सका।

23 सितंबर को, मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा द्वारा विभाजित फैसला सुनाया गया था। एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड (AoR) पवन रेले के माध्यम से दायर इस आवेदन में पीठ के उस सामान्य आदेश (मामले को 5-न्यायाधीशों की पीठ के पास भेजने) और न्यायमूर्ति शर्मा की राय को वापस लेने की मांग की गई है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि न्यायमूर्ति दत्ता की राय को वापस लेने की मांग नहीं की जा रही है।

आवेदकों का कहना है कि उनकी आपत्ति केवल इस बात को लेकर है कि जब उस संस्था के गठन और अधिकारियों की नियुक्तियों को सीधे चुनौती दी जा रही थी, तो क्या जज के परिवार के किसी करीबी सदस्य का उसी संस्था के साथ पेशेवर जुड़ाव होने पर जज को इस बात का खुलासा करना चाहिए था? याचिकाकर्ताओं के अनुसार, विभाजित फैसले के बाद उन्हें एक मीडिया रिपोर्ट के माध्यम से इस जुड़ाव के बारे में पता चला, जिसकी स्वतंत्र रूप से पुष्टि करने पर यह सही पाया गया कि न्यायमूर्ति एस.सी. शर्मा के बेटे मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में ईसीआई के स्थायी वकील हैं।

आवेदन में यह भी तर्क दिया गया है कि वास्तविक पक्षपात के प्रमाण की आवश्यकता नहीं है, बल्कि इस मुद्दे का आकलन एक निष्पक्ष और प्रबुद्ध व्यक्ति के दृष्टिकोण से किया जाना चाहिए। न्यायिक जीवन के मूल्यों के पुनरुत्थान (रेस्टatement ऑफ वैल्यूज ऑफ जुडिशल लाइफ) का हवाला देते हुए याचिका में आग्रह किया गया है कि न्यायाधीशों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि न केवल न्याय हो, बल्कि न्याय होता हुआ दिखना भी चाहिए। इसी पृष्ठभूमि में, न्यायमूर्ति शर्मा की राय को वापस लेने और मामले को नए सिरे से दो जजों के समक्ष सूचीबद्ध करने का अनुरोध किया गया है।