अवैज्ञानिक सोच और मुनाफे की राजनीति का कहर
परिभाषा बदलने से परेशानी बढ़ी है
पर्यावरण संहार के सारे फैसले हो रहे
दिल्ली तक इससे प्रभावित होगा, तय है
राष्ट्रीय खबर
नई दिल्ली: वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने रविवार को दावा किया कि मोदी सरकार द्वारा अरावली की परिभाषा को बदलने के फैसलों के कारण यह पर्वतमाला सबसे गंभीर खतरे में है। उन्होंने उम्मीद जताई कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित उच्चाधिकार प्राप्त समिति केंद्र के इन कदमों को खारिज कर देगी।
सोशल मीडिया पर अपनी बात रखते हुए रमेश ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार अरावली को नए सिरे से परिभाषित करने पर आमादा है ताकि वहां खनन, रियल एस्टेट और अन्य परियोजनाओं की अनुमति दी जा सके। उन्होंने कहा कि भारत के मुख्य न्यायाधीश के 9 फरवरी, 2027 को सेवानिवृत्त होने से पहले हमें अच्छी तरह पता चल जाएगा कि इन प्रस्तावों का क्या हश्र होता है।
कांग्रेस नेता ने कहा, मुझे उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई गई उच्चाधिकार प्राप्त समिति, जिसे अपनी रिपोर्ट सौंपने के लिए 30 नवंबर, 2026 की समय सीमा दी गई है, अरावली को फिर से परिभाषित करने के मोदी सरकार के प्रयासों को खारिज कर देगी। अन्यथा, इस तरह के और भी पर्यावरण-संहार (इकोसाइड) देखने को मिलेंगे।
विशेषज्ञों के अनुसार, अपनी प्राकृतिक दरारों और छिद्रों के कारण, अरावली पहाड़ियों में हर साल प्रति हेक्टेयर दो मिलियन लीटर पानी को जमीन के भीतर पहुंचाने की क्षमता है। यह विशेषता इस पर्वतमाला को उत्तर-पश्चिम भारत के कई क्षेत्रों के लिए एक महत्वपूर्ण जल पुनर्भरण (वॉटर रिचार्ज) क्षेत्र बनाती है, जहां अरावली दिल्ली से लेकर गुजरात तक फैली हुई है।
लेकिन इस श्रृंखला के साथ चूना पत्थर (लाइमस्टोन) और संगमरमर जैसी तलछटी चट्टानों के दशकों लंबे खनन के कारण कथित तौर पर नदी के बिस्तरों और जल निकायों के पास या उन पर कई खदानें और स्टोन क्रशर स्थापित हो गए हैं। इससे उस जल सुरक्षा को खतरा पैदा हो गया है जो अरावली कभी प्रदान करती थी। पिछले महीने पीटीआई ने इस बात पर प्रकाश डाला था कि कैसे खनन ने राजस्थान के कोटपूतली-बहरोड़ और सीकर जिलों को प्रभावित किया है।