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अटल पेंशन योजना की कैग रिपोर्ट से भारत की सच्चाई उजागर

आधे भारतीय 42 रुपया देने की स्थिति में नहीं

कुछ ही वर्षों में दम तोड़ रही योजना

आठ करोड़ लोग पंजीकृत हुए थे इसमें

लिखकर दिया है कि पैसे नहीं दे पायेंगे

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः विकसित भारत का ख्वाब दिखाकर केंद्र की मोदी सरकार ने जो फ्लैगशिप योजनाएं शुरू की हैं, उनमें अटल पेंशन योजना प्रमुख है। यह कहा गया था कि इस योजना के माध्यम से देश के साठ वर्ष से अधिक उम्र के नागरिकों की सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित होगी।

इसके तहत मासिक प्रीमियम मात्र 42 रुपये से शुरू होता है। लाभार्थी की आयु 60 वर्ष पार होने पर हर महीने एक हजार से पांच हजार रुपये तक की पेंशन मिलती है। कुछ ही वर्ष बीतने पर इस योजना की खस्ताहाल स्थिति सामने आ गई है। कैग अपनी ऑडिट रिपोर्ट में बता रहा है कि इस योजना के लगभग आधे ग्राहक नियमित रूप से प्रीमियम नहीं चुका पा रहे हैं।

अब तक इस योजना में पंजीकृत ग्राहकों की संख्या आठ करोड़ के करीब पहुंच रही है। उन आंकड़ों को सामने रखकर केंद्र ने सरकार के प्रचार-प्रसार में कोई कसर नहीं छोड़ी है। लेकिन प्रचार और वास्तविकता में जो भारी अंतर है, वह कैग की रिपोर्ट में स्पष्ट हो गया है। अटल पेंशन योजना की शुरुआत जून 2015 में हुई थी। सरकार ने बताया था कि उस वित्त वर्ष यानी 2015-16 में जो लोग इस योजना से जुड़ेगे, सरकार पांच वर्ष तक उनके प्रीमियम का आधा पैसा वहन करेगी। सब्सिडी की अधिकतम राशि प्रति वर्ष एक हजार रुपये थी।

केंद्र ने दिसंबर 2015 तक, यानी सात महीने के भीतर दो करोड़ नागरिकों को पेंशन योजना में पंजीकृत करने का लक्ष्य रखा था। लेकिन कैग का कहना है कि दिसंबर तक लक्ष्य पूरा होना तो दूर, मार्च 2016 तक केवल 20 लाख 97 हजार ग्राहक ही पंजीकृत हो पाए थे। यानी यह लक्ष्य का दसवां हिस्सा था। जो लोग उस समय ग्राहक बने थे, उनमें से केवल 50.83 प्रतिशत ग्राहक ही नियमित रूप से प्रीमियम जमा कर रहे हैं। बाकी लोग अनियमित रूप से प्रीमियम चुका रहे हैं।

संबंधित अधिकारियों का दावा है कि लगभग 1 करोड़ 20 लाख ग्राहक इस योजना को जारी रखने में असमर्थ होकर बीच में ही छोड़ चुके हैं। पश्चिम बंगाल में यह संख्या लगभग 10 लाख है। पिछले कुछ वर्षों से यह प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है कि लगभग 15 प्रतिशत ग्राहक प्रीमियम चुकाए बिना योजना छोड़ रहे हैं।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस मामले में अधिकांश लाभार्थियों का तर्क है कि उनके पास योजना को जारी रखने के लिए पर्याप्त धन नहीं है। इसका कारण यह है कि अप्रैल 2016 के बाद पंजीकृत होने वालों को केंद्र ने कोई सब्सिडी नहीं दी है। यदि यह वित्तीय सुविधा जारी रहती, तो शायद स्थिति इतनी दयनीय नहीं होती।