गुजरात ने इस बार कमाई का नय रास्ता खोल लिया है
अहमदाबादः बंगालियों के लिए भोजन की थाली में हिल्सा एक प्रमुख बात है। इस बार पश्चिम बंगाल में इसकी कमी होने के बाद भी गुजरात ने पहली बार इसका निर्यात प्रारंभ कर दिया है। मोदी के राज्य से सैकड़ों टन हिल्सा मछली वहां भेजे जा रहे हैं। उसे उल्टी गंगा बहना भी कहा जा सकता है। वरना अब तक इस मौसम में हर बार बांग्लादेश से हिल्सा मछली का भारत में आयात किया जाता था। अपने समुद्री खाड़ियों ने हिल्सा का प्रयोग सफल होने के बाद व्यापार कुशल गुजरात ने इसे अतिरिक्त कमाई का जरिया बना लिया है।
इस साल बांग्लादेश में उत्पादन कम होने के कारण उन्होंने भारत से हिल्सा मछली का आयात किया है, और वह भी इतिहास में पहली बार। आंकड़ों के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृहराज्य गुजरात से पिछले दो महीनों में 500 मीट्रिक टन हिल्सा मछली बांग्लादेश भेजी जा चुकी है। अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि ऐसी स्थिति में क्या इस बार बंगालियों की पूजा की थाली में पद्मा की प्रसिद्ध हिल्सा मछली पड़ पाएगी या नहीं!
त्योहारों के मौसम में यदि थाली में हिल्सा न हो, तो बंगालियों का मन नहीं भरता, चाहे बात इस पार की हो या ओपार बंगाल की। हिल्सा पकड़ने के मामले में बांग्लादेश दुनिया में पहले स्थान पर है और वैश्विक उत्पादन का 70 से 80 प्रतिशत हिस्सा वही पकड़ता है। हालांकि, इस साल बांग्लादेश में भी हिल्सा का उत्पादन काफी कम हुआ है। इस भारी कमी को पूरा करने के लिए बांग्लादेशी मछली व्यापारियों ने पिछले दो महीनों में गुजरात के भरूच बंदरगाह और हावड़ा थोक मछली बाजार से लगभग 500 मीट्रिक टन हिल्सा का आयात किया है। सिर्फ इतना ही नहीं, बल्कि उस मछली को प्रोसेस करके आगे विदेशों में भी भेजा गया है।
इस बार वहां हिल्सा की भारी कमी है, इसलिए पहली बार यहां से बांग्लादेश हिल्सा भेजी गई है। उन्होंने यह भी बताया कि बांग्लादेश के चटगांव और सिलहट में अंडे से भरी हिल्सा की मांग बहुत अधिक है और गुजरात में अंडे वाली हिल्सा प्रचुर मात्रा में मिलती है, इसलिए ढाका ने उसी राज्य से हिल्सा का आयात किया है। मकसुद के अनुसार, गुजरात से आयातित हिल्सा के अंडे भी वहां अलग से बेचे जा रहे हैं। साथ ही, उस मछली को प्रोसेस करके विदेशों में भी निर्यात किया जा रहा है। गुजरात से जो हिल्सा बांग्लादेश मंगाई जा रही है, उसे सुखाकर (लोटा इलिश या सूखी हिल्सा) स्थानीय बाजारों में भी बेचा जा रहा है।
गौरतलब है कि साल 2011 में ममता बनर्जी द्वारा तीस्ता जल समझौते को रोके जाने के बाद, अगले ही साल 1 अगस्त को बांग्लादेश ने सभी प्रकार की मछली के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था, जिसका मुख्य तर्क देश में पर्याप्त मछली की कमी बताना था। हालांकि 23 सितंबर 2011 को अन्य मछलियों पर से प्रतिबंध हटा लिया गया, लेकिन हिल्सा पर यह प्रतिबंध लगातार बना रहा। इसके बाद से समय के साथ हिल्सा के निर्यात के नियमों में कभी ढील दी गई तो कभी सख्ती बढ़ाई गई। वर्ष 2019 से बांग्लादेश केवल दुर्गा पूजा के उपहार के रूप में कुछ चुनिंदा मात्रा में हिल्सा भेजता आ रहा है, और महामारी के बाद से यह मात्रा और भी कम हो गई है।
पिछले साल बांग्लादेश सरकार ने 1,200 टन हिल्सा के निर्यात को मंजूरी दी थी, जिसके मुकाबले केवल 143.80 टन ही आ पाई थी, जबकि उससे पिछले दो वर्षों में यह मात्रा 600 टन से भी कम थी। अब सवाल यह है कि बांग्लादेश में नई सरकार के गठन के बाद इस बार क्या स्थिति बनेगी? बांग्लादेश की नई सरकार के तहत हिल्सा को लेकर यह रुख रहा है कि निर्यात औपचारिक रूप से बंद है और भारत को जो भी भेजा जाता है, वह सब केवल सौहार्दपूर्ण उपहार होता है। इस बार उपहार की मात्रा क्या होगी, यह अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाया है। मकसुद ने कहा कि उस देश में नई सरकार का गठन हुआ है और इस वर्ष इस पार के मछली व्यापारियों ने सीधे बांग्लादेश सरकार के मत्स्य विभाग से हिल्सा मछली के लिए आवेदन किया है, लेकिन पद्मा की स्वादिष्ट हिल्सा बाजार में कब उतरेगी, यह अभी साफ नहीं है।