जेनोट्रांसप्लांटेशन में जेनेटिक एडिटिंग कारगर
अंग प्रत्यारोपण में एक कदम प्रगति
जिनोम में कई बदलाव किये गये थे
ऑर्गन ट्रांसप्लांट की दिशा में उपलब्धि
राष्ट्रीय खबर
रांचीः चिकित्सा विज्ञान और आधुनिक अनुसंधान के क्षेत्र में ज़ेनोट्रांसप्लांटेशन (एक प्रजाति से दूसरी प्रजाति में अंग प्रत्यारोपण) को लेकर एक अभूतपूर्व सफलता हासिल हुई है। दुनिया भर में किडनी की गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लाखों मरीजों के लिए यह खबर एक नई उम्मीद की किरण लेकर आई है। हाल ही में प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल द लैंसेट में प्रकाशित एक नए अध्ययन के अनुसार, आनुवंशिक रूप से संपादित (जेनेटिकली मॉडिफाइड) सुअर की किडनी को इंसानों में ट्रांसप्लांट करने के क्लिनिकल ट्रायल के परिणाम बेहद सकारात्मक और उत्साहजनक रहे हैं।
देखें इस संबंध में चीन के वैज्ञानिकों का पूर्व कमाल
पारंपरिक रूप से अंग प्रत्यारोपण के क्षेत्र में सबसे बड़ी बाधा मानव अंगों की भारी कमी है। हर साल हजारों मरीज मानव किडनी की प्रतीक्षा सूची में रहते हुए दम तोड़ देते हैं। इस संकट से निपटने के लिए वैज्ञानिकों ने सुअरों के अंगों का रुख किया, क्योंकि उनका आकार और कार्यप्रणाली इंसानों से काफी मेल खाती है। हालांकि, सबसे बड़ी चुनौती मानव प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) द्वारा बाहरी अंगों को तुरंत अस्वीकार करने और गंभीर प्रतिक्रिया देने की होती है। इस बाधा को पार करने के लिए, वैज्ञानिकों ने अत्याधुनिक जीन-एडिटिंग तकनीक का उपयोग करके सुअर के जीनोम में दर्जनों बदलाव किए। इसमें उन जीनों को हटाना शामिल है जो तीव्र अस्वीकृति का कारण बनते हैं और ऐसे मानव अनुकूल जीन जोड़ना शामिल है जिससे शरीर अंग को आसानी से स्वीकार कर सके।
हाल ही में सामने आए एक ऐतिहासिक क्लिनिकल मामले में, एक मरीज ने जेनेटिकली मॉडिफाइड सुअर की किडनी के साथ रिकॉर्ड 271 दिनों (लगभग नौ महीने) तक बिना डायलिसिस के जीवन व्यतीत किया। यह किसी जीवित इंसान में सुअर के अंग के साथ सबसे लंबे समय तक जीवित रहने का रिकॉर्ड है। डॉक्टरों के अनुसार, यह तकनीक उन मरीजों के लिए एक अस्थायी ब्रिज या सेतु का काम कर सकती है, जो मानव अंग मिलने का इंतजार कर रहे हैं। इस दौरान मरीजों को डायलिसिस के कष्टदायक चक्र से मुक्ति मिलती है।
यद्यपि कुछ महीनों बाद संक्रमण और मामूली जटिलताओं के कारण सुअर के अंग को हटाना पड़ा और मरीज को वापस कुछ समय के लिए डायलिसिस पर जाना पड़ा, लेकिन इसके तुरंत बाद उस मरीज सफलतापूर्वक एक मानव किडनी का प्रत्यारोपण किया गया। वैज्ञानिकों का कहना है कि शरीर में कुछ समय के लिए सुअर का अंग रहने से बाद में मानव अंग के प्रत्यारोपण पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता है। यह सफलता मेडिकल इंडस्ट्री और ऑर्गन ट्रांसप्लांट के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हो रही है, जिससे भविष्य में अंगदान की कमी के संकट को हमेशा के लिए खत्म करने का मार्ग प्रशस्त हो रहा है।
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