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आठ बागी विधायकों की सदस्यता रद्द करने की मांग, सुलह पर विराम

स्पीकर के फैसले के खिलाफ बीजेडी पहुंची हाईकोर्ट

विधानसभा अध्यक्ष के फैसले का विरोध

तमाम अटकलबाजियों की हवा निकल गयी

ऐसे किसी बागी को अब माफी नहीं मिलेगी

प्रसन्न मोहंति

भुवनेश्वरः ओडिशा की राजनीति में इन दिनों एक बेहद दिलचस्प और गरमागरम सियासी ड्रामा देखने को मिल रहा है, जहाँ मुख्य विपक्षी दल बीजू जनता दल (बीजेडी) ने विधानसभा अध्यक्ष सूरमा पाढ़ी के एक विवादास्पद फैसले को सीधे तौर पर उड़ीसा हाईकोर्ट में चुनौती देकर यह स्पष्ट कर दिया है कि पार्टी अपने भीतर के बागी और बागी तेवर दिखाने वाले विधायकों को लेकर किसी भी प्रकार की नरमी या समझौते के मूड में बिल्कुल नहीं है।

बीजेडी की मुख्य सचेतक प्रमिला मल्लिक द्वारा गुरुवार को दायर की गई इस महत्वपूर्ण रिट याचिका ने उन तमाम राजनीतिक अटकलों, कयासों और चर्चाओं पर पूरी तरह से विराम लगा दिया है, जो पिछले कुछ दिनों से ओडिशा के राजनीतिक गलियारों में जोर-शोर से तैर रही थीं कि पार्टी आलाकमान आगामी 2029 के विधानसभा चुनावों से पहले अपने संगठन को जमीनी स्तर पर और अधिक मजबूत करने के उद्देश्य से बागी हुए सभी 8 विधायकों को माफ करके एक बार फिर पार्टी के मुख्य कुनबे में वापस शामिल कर सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यहाँ तक चर्चा थी कि इस संबंध में पर्दे के पीछे गुप्त रूप से समझौते की बातचीत भी चल रही है।

लेकिन उड़ीसा हाईकोर्ट की देहरी पर जाकर बागी विधायकों की सदस्यता रद्द करने की पुरजोर मांग उठाने के साथ ही बीजेडी ने यह पुख्ता तौर पर साबित कर दिया है कि वे सारी चर्चाएँ पूरी तरह से निराधार और कोरी कल्पना मात्र थीं। पार्टी का अंदरूनी और बाहरी रुख इस मामले में बेहद कड़ा और स्पष्ट है कि संगठन के भीतर अनुशासनहीनता को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

बीजेडी के एक वरिष्ठ और प्रभावशाली नेता ने अपनी पहचान गोपनीय रखने की शर्त पर राष्ट्रीय खबर से अनौपचारिक बातचीत में इस बात पर मुहर लगाते हुए कहा कि जो लोग यह मुंगेरी लाल के हसीन सपने देख रहे थे कि पार्टी उन्हें आसानी से माफ कर वापस गले लगा लेगी, उनके लिए यह कानूनी कदम एक बेहद कड़ा, स्पष्ट और चेतावनी भरा संदेश है। यह कानूनी और राजनीतिक लड़ाई अब केवल विधानसभा अध्यक्ष के उस फैसले के खिलाफ नहीं रह गई है, बल्कि यह पार्टी की राजनीतिक साख, आंतरिक अनुशासन और वैचारिक शुद्धता को बचाने की एक निर्णायक जंग बन चुकी है।

इस पूरे राजनीतिक घमासान की जड़ें मार्च 2026 में हुए राज्यसभा चुनावों के दौरान रोपी गई थीं, जब बीजेडी के इन 8 बागी विधायकों ने पार्टी द्वारा जारी व्हिप और निर्धारित राजनीतिक लाइन के पूरी तरह खिलाफ जाकर मतदान किया था, जिससे पार्टी को भारी फजीहत का सामना करना पड़ा था।

इस गंभीर अनुशासनहीनता से नाराज होकर बीजेडी ने फौरन उन सभी विधायकों को सदन की सदस्यता से अयोग्य ठहराने के लिए विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष एक औपचारिक याचिका दायर की थी। हालांकि, विधानसभा अध्यक्ष सूरमा पाढ़ी ने उस याचिका को बिना किसी विस्तृत सुनवाई के सिरे से खारिज कर दिया था, जिससे पार्टी का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया था। अब बीजेडी ने अध्यक्ष के उसी एकतरफा फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देकर कानूनी लड़ाई का बिगुल फूँक दिया है, जिससे आने वाले दिनों में ओडिशा की राजनीति में और अधिक भूचाल आने की पूरी संभावना है।