भाजपा के एनजीओ से कमाई के चाल में फंसी है हेमंत सरकार
हर साल लाखों के वारे न्यारे हो रहे
कई प्रमुख अफसर भी इसमें शामिल
हाईकोर्ट में केस दर्ज पर सरकारी सुस्ती
राष्ट्रीय खबर
रांचीः राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) अपनी चिकित्सा सेवाओं के साथ-साथ अक्सर प्रशासनिक और वित्तीय अनियमिताओं को लेकर चर्चा में रहता है। हालिया शुरुआती पड़ताल से यह बात सामने आई है कि संस्थान परिसर के भीतर मरीजों को त्वरित और बेहतर पैथोलॉजिकल सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से स्थापित की गई उन्नत जांच मशीनों के संचालन में गंभीर स्तर पर वित्तीय अनियमितताएं बरती जा रही हैं। यह पूरा मामला रिम्स में मरीजों के रक्त परीक्षण (ब्लड टेस्ट) और अन्य महत्वपूर्ण नैदानिक जांचों से जुड़ा हुआ है।
इस व्यवस्था के संचालन की कमान झारखंड के एक प्रभावशाली और कद्दावर भाजपा नेता से जुड़े एक गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) के हाथों में है। प्रारंभिक राजनीतिक गलियारों और मीडिया हलकों में इस बात की चर्चा पहले भी दबी जुबान से होती रही है, लेकिन पिछली सरकारों के दौरान राजनीतिक रसूख के चलते यह मामला प्रभावी रूप से दबा दिया गया था। मौजूदा समय में भी, राज्य में हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली सरकार के होने के बावजूद, स्वास्थ्य विभाग के शीर्ष स्तर तक इस पूरे प्रकरण की भनक नहीं लगने दी गई है। जांच के शुरुआती संकेतों से यह अंदेशा पुख्ता होता है कि रिम्स के कई प्रमुख प्रशासनिक पदाधिकारी भी इस अनधिकृत व्यवस्था में हिस्सेदार हैं, और इस अवैध कमाई का एक बड़ा हिस्सा उनकी जेबों तक भी पहुंच रहा है।

तकनीकी दृष्टिकोण से मशीनें सही ढंग से काम कर रही हैं और मरीजों को तय समय पर रिपोर्ट भी मिल रही हैं, इसलिए आम तौर पर किसी को गड़बड़ी का संदेह नहीं होता है। असली खेल इन मशीनों के संचालन में लगने वाले उपभोग्य सामग्रियों (कंस्यूमेबल्स) और रासायनिक यौगिकों (केमिकल रीजेंट्स) की खरीद में किया जा रहा है। बाजार में इन रसायनों की जो वास्तविक और वास्तविक खुदरा कीमत है, अनुबंध के तहत बिलिंग में उससे कई गुना अधिक दाम दिखाए जा रहे हैं।
इस मूल्य अंतर और बिलिंग की चालाकी से तैयार किए गए पर्दे के पीछे हर साल लाखों-करोड़ों रुपये की अवैध कमाई हो रही है। विभागीय जानकारों को इस हेरफेर की पूरी जानकारी है, लेकिन प्रशासनिक मिलीभगत के कारण यह बात मुख्यमंत्री या स्वास्थ्य मंत्री के संज्ञान में नहीं आ पाई है। इस तरह, जनता के स्वास्थ्य के नाम पर मिलने वाले सरकारी संसाधन और व्यवस्था की आड़ में एक बड़ा वित्तीय घोटाला निरंतर संचालित हो रहा है, जिसका सीधा लाभ संबंधित राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले एनजीओ और रिम्स के कुछ भ्रष्ट अधिकारियों को मिल रहा है। अब यह मामला चूंकि हाईकोर्ट तक पहुंच गया है तो समझा जा रहा है कि वहां मामले की सुनवाई के दौरान नये तथ्य सामने आयेंगे।