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अब तो सही सही आचरण करे चुनाव आयोग

भारत निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटाए जाने की रिपोर्टों ने एक बार फिर पुनरीक्षण प्रक्रियाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस संपूर्ण प्रक्रिया की पारदर्शिता, सटीकता और प्रशासनिक रवैये को लेकर देशभर में आशंकाएं और चिंताएं गहराई हैं। इस पुनरीक्षण अभ्यास के तीसरे चरण में ही 16 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में दर्ज कुल 36 करोड़ नामों में से 6 करोड़ से भी अधिक नाम मतदाता सूची से बाहर कर दिए गए हैं। यह आंकड़ा केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं है, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक ढांचे के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है।

विभिन्न राज्यों से सामने आ रहे आंकड़े बेहद चिंताजनक हैं और यह दर्शाते हैं कि किस प्रकार व्यापक स्तर पर लोगों के नाम सूचियों से गायब हुए हैं। देश की राजधानी दिल्ली में लगभग 48 लाख नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। इसका सीधा अर्थ यह है कि दिल्ली में प्रत्येक तीन में से एक मतदाता का नाम काट दिया गया है। यह देश के किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में नाम हटाए जाने का सबसे अधिक अनुपातिक प्रतिशत है।

महाराष्ट्र में प्रशासनिक पुनरीक्षण के नाम पर 2 करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम सूची से बाहर कर दिए गए हैं। कर्नाटक में 1.07 करोड़ से अधिक लोगों के नाम हटाए गए हैं। इसके अलावा, तेलंगाना में 73 लाख से अधिक, आंध्र प्रदेश में 44 लाख और झारखंड में लगभग 43 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए हैं। लोकतंत्र में मताधिकार केवल एक वैधानिक अधिकार नहीं है, बल्कि यह नागरिकों की राजनीतिक भागीदारी की सबसे मूलभूत कुंजी है।

जब कोई भी प्रशासनिक या संस्थागत प्रक्रिया इतने बड़े पैमाने पर मतदाताओं को मताधिकार से वंचित कर देती है, तो वह प्रक्रिया स्वयं अलोकतांत्रिक हो जाती है। जब लाखों-करोड़ों लोग बिना किसी पारदर्शी सूचना के एक ही झटके में मतदान प्रणाली से बाहर कर दिए जाते हैं, तो यह सीधे तौर पर नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का हनन है। पश्चिम बंगाल का उदाहरण इस प्रशासनिक प्रक्रिया की खामियों को सबसे स्पष्ट और डरावने रूप में उजागर करता है।

राज्य में विधानसभा चुनावों से ठीक पहले यह पुनरीक्षण प्रक्रिया चलाई गई थी, जिसमें लगभग 90 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए। लगभग 38 लाख लोग इस समय अपने नाम सूची से हटाए जाने के खिलाफ अपीलीय न्यायाधिकरणों के समक्ष न्याय और निर्णयों का इंतजार कर रहे हैं। जिन मामलों का निपटारा अब तक इन न्यायाधिकरणों द्वारा किया जा चुका है, उनमें से 91 प्रतिशत से अधिक लोगों के मताधिकार को बहाल कर दिया गया है।

यह 91 प्रतिशत का आंकड़ा स्पष्ट रूप से साबित करता है कि निर्वाचन आयोग ने बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम गलत तरीके से सूची से हटाए थे और उनसे उनके वोट देने के अधिकार को अनुचित रूप से छीन लिया था। इस पूरे प्रकरण में यह दुखद पहलू भी सामने आया कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी शुरुआत में इस विवादित प्रक्रिया को अपनी स्वीकृति दे दी थी, जिसके कारण अंततः लाखों नागरिकों को चुनाव में वोट डालने से वंचित होना पड़ा।

वर्तमान में स्थिति यह है कि न्यायाधिकरणों के साथ-साथ कलकत्ता उच्च न्यायालय में रोजाना एसआईआर से जुड़े लगभग 40 मामलों की सुनवाई हो रही है, जो यह स्पष्ट करता है कि प्रशासनिक चूक कितनी गहरी और व्यापक थी। नाम हटाए जाने की इस कवायद का प्रभाव केवल व्यक्तिगत नागरिकों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने कई राज्यों के राजनीतिक समीकरणों और चुनावी परिणामों की वैधता को भी प्रभावित किया है: हैदराबाद जिले के सभी 15 विधानसभा क्षेत्रों में मतदाता सूची से हटाए गए नामों की संख्या, वर्ष 2023 के विधानसभा चुनावों में इन क्षेत्रों के विजयी उम्मीदवारों के जीत के अंतर से काफी अधिक है।

इसका सीधा मतलब यह है कि यदि ये नाम नहीं हटाए गए होते, तो चुनावी परिणाम कुछ और हो सकते थे। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, दिल्ली के कई ऐसे निर्वाचन क्षेत्रों में नाम हटाए जाने की दर सामान्य औसत से काफी अधिक पाई गई है, जहां अल्पसंख्यक और अनुसूचित जाति समुदायों की आबादी अधिक है। यह इस प्रक्रिया के निष्पक्ष होने पर गंभीर नैतिक और सामाजिक प्रश्न उठाता है। महाराष्ट्र में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने नाम हटाए जाने की इस पूरी प्रक्रिया को वोट चोरी के अपने आरोपों का सीधा प्रमाण बताया है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि एक स्वच्छ, अद्यतन और सटीक मतदाता सूची बनाए रखना भारत निर्वाचन आयोग का संवैधानिक अधिकार और प्राथमिक उत्तरदायित्व है।