आई ड्रॉप्स से अंधे चूहे देखने लगे हैं
कोशिकाओं को सक्रिय करने में सफलता
लाइट-एक्टिवेटेड दवाओं से नई उम्मीद
इंसानों पर शीघ्र परीक्षण प्रारंभ होगा
राष्ट्रीय खबर
रांचीः आंख के फोटोरिसेप्टर सेल्स का खराब होना दृष्टिहीनता के कई प्रमुख कारणों में से एक है, जिसमें एज-रिलेटेड मैकुलर डीजनरेशन और रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा शामिल हैं। दुनिया भर में करीब 20 करोड़ लोग इन बीमारियों से प्रभावित हैं। दृष्टिहीनता न केवल स्वतंत्रता और जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करती है, बल्कि इसके कारण हर साल स्वास्थ्य देखभाल और कार्यक्षमता के नुकसान से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर 400 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक का वित्तीय बोझ पड़ता है।
इन बीमारियों में रेटिना की फोटोरिसेप्टर कोशिकाएं, जो प्रकाश को पहचानती हैं, धीरे-धीरे नष्ट हो जाती हैं। हालांकि, रेटिना के भीतर मौजूद तंत्रिका तंत्र (न्यूरल सर्किटरी) का एक बड़ा हिस्सा सुरक्षित और कार्य करने में सक्षम रहता है। फोटोरिसेप्टर्स के बिना ये जीवित कोशिकाएं प्रकाश के संकेत प्राप्त नहीं कर पातीं, जिससे मस्तिष्क तक दृश्य जानकारी नहीं पहुंचती।
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वैज्ञानिकों ने इसी बचे हुए रेटिना सर्किट को अपना लक्ष्य बनाया है। वर्तमान में जीन थेरेपी और इलेक्ट्रॉनिक रेटिनल प्रोस्थेसिस जैसे तरीके उपलब्ध हैं, लेकिन जीन थेरेपी केवल विशिष्ट उत्परिवर्तन वाले मरीजों के लिए उपयुक्त है, जबकि इलेक्ट्रॉनिक प्रोस्थेसिस काफी महंगी, जटिल और सर्जरी-आधारित तकनीक है।
इंस्टीट्यूट फॉर बायोइंजीनियरिंग ऑफ कैटालोनिया (आईबीईसी) के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने फोटोस्विचेबल अणुओं से बनी दवाओं की एक नई श्रेणी विकसित की है, जिसे जर्नल ऑफ दी अमेरिकन केमिकल सोसायटी (जेएसीएस) में प्रकाशित किया गया है।
ये रासायनिक यौगिक फोटोरिसेप्टर्स का काम खुद संभाल लेते हैं। इन्हें आंख में इंजेक्शन या आई ड्रॉप के रूप में दिया जा सकता है। इसमें किसी जेनेटिक बदलाव या इंप्लांट की आवश्यकता नहीं होती। फोटोफार्माकोलॉजी पर आधारित इस तकनीक में प्रकाश के संपर्क में आते ही दवा का मॉलिक्यूलर स्विच सक्रिय हो जाता है।
शोधकर्ताओं ने प्रोस्थे 6 नामक यौगिकों का निर्माण किया, जो ऑन-बायपोलर न्यूरॉन्स को लक्षित करते हैं। परीक्षण के दौरान प्रोस्थे12 और प्रोस्थे 15 नामक दो यौगिकों ने बहुत आशाजनक परिणाम दिखाए। अंधे चूहों की आंखों में ये ड्रॉप्स डालने पर वे फिर से प्राकृतिक रूप से अंधेरे स्थानों को चुनने लगे। यह इस बात का संकेत है कि वे सामान्य रोशनी (कमरों की लाइट या बादलों वाले दिन की रोशनी) में भी देखने में सक्षम हो गए थे।
आईबीईसी के प्रोफेसर पाउ गोरोस्टिज़ा के अनुसार, यह दवा अंधापन पूरी तरह खत्म नहीं करती, लेकिन बेहद सरल और मरीज के अनुकूल तरीके से देखने की क्षमता बहाल करती है। प्रोस्थे6 6 तकनीक का पेटेंट करा लिया गया है और शोधकर्ता अब इसे इंसानों पर नैदानिक परीक्षणों के लिए विकसित करने पर काम कर रहे हैं। यदि यह तकनीक सफल होती है, तो यह उन्नत रेटिनल डीजनरेशन से जूझ रहे करोड़ों मरीजों के लिए एक किफायती और सुलभ उपचार बन सकती है।
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