दिमागी नक्सल वाली टिप्पणी पर राजनीतिक बहस जारी है
किरेण रिजिजू के बयान पर पलटवार
किसके लिए शब्द कहा, यह तो बताएं
अपमानजनक शब्द गढ़े जाते हैं बार बार
राष्ट्रीय खबर
नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दिमागी नक्सल वाली टिप्पणी को लेकर राजनीतिक विवाद सोमवार को और गहरा गया। वरिष्ठ कांग्रेस नेता और राज्यसभा सांसद पी. चिदंबरम ने केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू पर तीखा पलटवार किया। उन्होंने रिजिजू के उस स्पष्टीकरण को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि प्रधानमंत्री की टिप्पणी विपक्ष के लिए नहीं थी, और इसके साथ ही उन्होंने सवाल किया कि आखिर यह शब्द किसके लिए इस्तेमाल किया गया था। चिदंबरम ने अपने उस हालिया सोशल मीडिया पोस्ट का बचाव किया जिसमें उन्होंने खुद को गर्व से दिमागी नक्सली बताया था। उन्होंने दावा किया कि सत्ताधारी पार्टी ने विपक्षी आवाजों को निशाना बनाने के लिए बार-बार अलग-अलग अपमानजनक शब्दों गढ़े हैं।
चिदंबरम ने कहा, दिमागी नक्सली क्या होता है? वे इसे परिभाषित करें। किरेन रिजिजू ने एक बहाना बनाया कि जब प्रधानमंत्री ने दिमागी नक्सली कहा, तो उनका इशारा विपक्ष की तरफ नहीं था। ठीक है, हम इसे मान लेते हैं, तो फिर उनका इशारा किसकी तरफ था? उन्हें स्पष्ट रूप से यह बताना चाहिए। वे किसे दिमागी नक्सली कह रहे थे? उन्होंने हमें अर्बन नक्सल कहा, देशविरोधी कहा, टुकड़े-टुकड़े गैंग कहा और अब वे हमें दिमागी नक्सली कह रहे हैं। अर्बन नक्सल कौन थे? टुकड़े-टुकड़े गैंग कौन था? देशविरोधी कौन थे? दिमागी नक्सली कौन हैं? यह सब विपक्ष के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले अलग-अलग शब्द हैं। वे केवल विपक्षी दलों और उनके नेताओं की बात कर रहे हैं। इसलिए, चूंकि मैं विपक्ष का एक सदस्य हूं, मैंने कहा कि मुझे अर्बन नक्सल होने पर गर्व है। इस देश में कई लोगों को बौद्धिक नक्सली होने पर गर्व है।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा पैलेट गन से घायल होने के मामले में प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए राजधानी में संसद पुलिस स्टेशन पर दिए गए धरने का जिक्र करते हुए चिदंबरम ने कहा कि राहुल गांधी ने प्रशासनिक देरी के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय से सवाल पूछकर बिल्कुल सही कदम उठाया। उन्होंने कहा, गृह मंत्री से सवाल पूछने में राहुल गांधी पूरी तरह सही थे। पीड़ित व्यक्ति एक थाने से दूसरे थाने गया, लेकिन कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार हर आपराधिक शिकायत पर एफआईआर दर्ज होनी चाहिए। जब राहुल गांधी पीड़ित के साथ थाने गए, तो उन्हें एफआईआर दर्ज कराने में 7 घंटे लग गए, जबकि घटना के 30 दिन बाद एफआईआर दर्ज हुई। इससे पता चलता है कि ऊपर से थाने को निर्देश दिए जा रहे थे कि एफआईआर दर्ज न की जाए। इसलिए, राहुल गांधी ने जो किया वह सही था और अंततः सत्याग्रह की जीत हुई।