लोकसभा सीटों के परिसीमन पर कांग्रेस को अब भी भरोसा नहीं
राष्ट्रीय खबर
नई दिल्ली: संसद के आगामी मानसून सत्र में केंद्र की सत्ताधारी पार्टी द्वारा एक महत्वपूर्ण संविधान संशोधन विधेयक लाने की तैयारी की जा रही है। इस विधेयक का एक बेहद अहम हिस्सा लोक सभा सीटों के पुनर्गठन या परिसीमन से जुड़ा ऐतिहासिक कानून है। इसे लेकर राष्ट्रीय राजनीति में घमासान तेज हो गया है। इसी बीच, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस संवेदनशील विषय पर आम सहमति बनाने और विस्तृत चर्चा के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखकर तत्काल सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की है।
सूत्रों के अनुसार, सरकार आगामी मानसून सत्र में हर हाल में महिला आरक्षण संशोधन और परिसीमन कानून को पारित कराने के लिए बेहद गंभीर है। इसके लिए पर्दे के पीछे राजनीतिक समीकरणों को साधने और विभिन्न दलों में तोड़-फोड़ की रणनीतियां भी शुरू हो चुकी हैं। हालांकि, सरकार इस बात से भली-भांति वाकिफ है कि संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए केवल विपक्षी खेमे में फूट डालना काफी नहीं होगा, बल्कि इसके लिए विपक्षी दलों के एक बड़े हिस्से का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष समर्थन बेहद जरूरी है।
दूसरी तरफ, विपक्षी गठबंधन इंडिया का आरोप है कि सरकार अपनी चुनावी सहूलियत के हिसाब से निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और लोक सभा सीटों के ढांचे में मनमाना बदलाव करना चाहती है। विपक्ष का मानना है कि लोक सभा चुनावों से पहले इस तरह के बदलाव करके सरकार विपक्षी दलों की चुनावी राह को और अधिक कठिन बनाने का प्रयास कर रही है। विशेषकर कांग्रेस इस प्रस्तावित परिसीमन कानून के पीछे गहरी राजनीतिक साजिश और अपने भविष्य के लिए खतरे के बादल देख रही है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का आरोप है कि परिसीमन के नाम पर देश के जनसांख्यिकीय संतुलन को प्रभावित कर भाजपा चुनावों में गणितीय लाभ उठाना चाहती है।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने गुरुवार को प्रधानमंत्री मोदी को लिखे अपने पत्र की बात सार्वजनिक की। किसी भी प्रकार की नई कानूनी या संवैधानिक प्रक्रिया शुरू करने से पहले देश के सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के साथ व्यापक विचार-विमर्श किया जाना चाहिए। इसके अलावा, प्रस्तावित बदलावों और नए प्रस्तावों की बारीकी से समीक्षा करने के लिए विपक्षी दलों को पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए।
परिसीमन के विरोध में कांग्रेस और इंडिया गठबंधन की मुख्य चिंता देश के भौगोलिक प्रतिनिधित्व और विशेषकर उत्तर बनाम दक्षिण के बीच राजनीतिक असंतुलन को लेकर है। विपक्ष का तर्क है कि यदि शुद्ध रूप से जनसंख्या के आधार पर परिसीमन किया गया, तो उत्तर भारत के राज्यों (जहां जनसंख्या नियंत्रण के प्रयास कम प्रभावी रहे) की लोक सभा सीटें अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाएंगी। वहीं, दक्षिण भारत के राज्यों ने दशकों से राष्ट्रीय नीतियों का पालन करते हुए जनसंख्या को नियंत्रित किया है, इसलिए उन्हें कम सीटें मिलेंगी और संसद में उनका प्रतिनिधित्व कमजोर हो जाएगा।