जलवायु परिवर्तन का नया आयाम नजर आने लगा है अब
राष्ट्रीय खबर
नई दिल्ली: एक खास तरह के बादल, जो कभी भारतीय मानसून की मुख्य पहचान हुआ करते थे, पिछले 30 से अधिक वर्षों से इस क्षेत्र में दिखाई नहीं दिए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इस बदलाव के कारण भारत में मानसून अधिक तीव्र और अप्रत्याशित होता जा रहा है। जलवायु परिवर्तन का असर भारत में केवल दर्ज की जाने वाली मानसूनी बारिश में ही नहीं, बल्कि इस क्षेत्र में बनने वाले बादलों के प्रकारों में भी देखा जा रहा है।
निजी मौसम पूर्वानुमान सेवा स्काईमेट वेदर के उपाध्यक्ष महेश पलावत ने कहा कि भारत में मानसूनी बारिश की अवधि छोटी और अधिक तीव्र होती जा रही है, और इसका एक मुख्य कारण हाल के दशकों में इस क्षेत्र में बनने वाले बादलों का प्रकार है।
ऑल्टोस्ट्रेटस बादल, जो कभी भारतीय मानसून से जुड़े माने जाते थे, अब भारतीय क्षेत्र, विशेष रूप से दिल्ली-एनसीआर के ऊपर बहुत कम दिखाई देते हैं। ये बादल आमतौर पर लंबे समय तक हल्की या कम मात्रा में बारिश लाते थे। अब इन बादलों की जगह क्युमुलोनिम्बस बादलों ने ले ली है, जिन्हें गरज वाले बादल (थंडरस्टॉर्म) भी कहा जाता है। इनकी विशेषता मूसलाधार बारिश, बिजली कड़कना, ओलावृष्टि और तेज हवाएं हैं।
पलावत ने बताया, 1980 के दशक तक दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में ऑल्टोस्ट्रेटस बादल बनते थे, जो लगातार कई दिनों तक कम तीव्रता वाली बारिश लाते थे। लेकिन 1990 के दशक से इस क्षेत्र में इन बादलों का बनना बंद हो गया है। उन्होंने आगे कहा, अब भले ही हमें मिलने वाली बारिश की कुल मात्रा समान हो, लेकिन यह छोटे अंतरालों में आने के बजाय एक ही बार में भारी मात्रा में बरस रही है।
ऑल्टोस्ट्रेटस बादल मध्यम स्तर के बादल होते हैं, जो अक्सर लगातार धूसर या नीले-धूसर रंग की चादर की तरह दिखाई देते हैं। चूंकि ये एक समान और बड़े क्षेत्र में फैले होते हैं, इसलिए ये आमतौर पर भारी बारिश तो नहीं करते, लेकिन लगातार नमी बनाए रखते हैं। ये बादल केवल 8,000 से 12,000 फीट की ऊंचाई के बीच होते हैं लेकिन सैकड़ों किलोमीटर तक फैल सकते हैं, जिससे दिनों तक हल्की बौछारें पड़ती हैं।
दूसरी ओर, क्युमुलोनिम्बस बादल भारी और लंबवत रूप से ऊंचे उठने वाले बादल होते हैं जो गंभीर मौसम से जुड़े हैं। इन बादलों को 50,000 फीट की ऊंचाई तक पहुंचने के लिए जाना जाता है। विशेषज्ञों ने कहा कि चूंकि ऑल्टोस्ट्रेटस बादल बड़े टुकड़ों में होते हैं, इसलिए क्युमुलोनिम्बस बादलों की तुलना में इनकी बारिश का पूर्वानुमान लगाना बहुत आसान होता है। क्युमुलोनिम्बस बादल छोटे और खंडित होते हैं, जिनका समय पर पूर्वानुमान लगाना अधिक कठिन होता है। भारत मौसम विज्ञान विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि मानसून के इस बदलते रुख और बादलों के बनने के पैटर्न के पीछे जलवायु परिवर्तन और अत्यधिक शहरीकरण संभावित कारकों में शामिल हैं।