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प्याज के परत की तरह खुल रहे हैं नये नये राज

कुंभ के दौरान ही सबसे बड़ी चोरी हुई

  • पहले से ही रही थी छोटी चोरी

  • कुंभ के दौरान भारी भीड़ उमड़ी

  • एक सुनियोजित साजिश थी चोरी

राष्ट्रीय खबर

लखनऊः अयोध्या के राम मंदिर में हुए दान चोरी के मामले में पुलिस जांच ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। एसआईटी की जांच के अनुसार, मंदिर में दान के पैसों की सबसे अधिक चोरी वर्ष 2025 की शुरुआत में आयोजित कुंभ मेले के दौरान हुई। पुलिस का कहना है कि आरोपी कुंभ से पहले भी छोटी-मोटी चोरियां कर रहे थे, लेकिन मेले के दौरान भक्तों की भारी भीड़ और दान में आई रिकॉर्ड वृद्धि का लाभ उठाकर उन्होंने एक बड़ी चोरी को अंजाम दिया।

इस मामले में अब तक आठ लोगों को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें अविनाश शुक्ला, अनुकल्प मिश्रा, लव कुश मिश्रा, मनीष कुमार यादव, करुणेश पांडेय, रमाशंकर मिश्रा, सुभाष श्रीवास्तव और रमाशंकर यादव उर्फ टिंकू यादव शामिल हैं। इन सभी आरोपियों से एसआईटी द्वारा घंटों कड़ी पूछताछ की गई, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि यह पूरी घटना एक सुनियोजित साजिश थी।

जांच में सबसे चौंकाने वाली बात जीजा-साले की जोड़ी (लवकुश मिश्रा और अनुकल्प मिश्रा) की भूमिका को लेकर सामने आई है। पुलिस के मुताबिक, इन दोनों ने सबसे अधिक नकदी चुराई और उस काले धन से कई संपत्तियां खरीदीं। अब तक पुलिस ने उनसे जुड़ी आधा दर्जन से अधिक संपत्तियों का पता लगाया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए, अयोध्या पुलिस अब आयकर विभाग की मदद ले रही है। साथ ही, वित्तीय लेन-देन और मनी ट्रेल की गहराई से जांच के लिए प्रवर्तन निदेशालय को भी पत्र लिखा जा रहा है।

इस मामले ने अब एक नया मोड़ ले लिया है क्योंकि राम मंदिर ट्रस्ट के पूर्व ट्रस्टी अनिल मिश्रा का नाम मुख्य आरोपियों के बयानों में बार-बार सामने आ रहा है। आरोप है कि मंदिर में अधिकांश नियुक्तियां, जिनमें उनके कई रिश्तेदार भी शामिल थे, उन्हीं की सिफारिश पर हुई थीं। एसआईटी अब इस बात की भी जांच कर रही है कि क्या अनिल मिश्रा ने नौकरी दिलाने के बदले कमीशन लिया था। ज्ञात हो कि अनिल मिश्रा और महासचिव चंपत राय पहले ही ट्रस्ट से इस्तीफा दे चुके हैं और उनसे भी पूछताछ की जा चुकी है।

इसके अलावा, मंदिर में नकदी गिनने वाली वाराणसी की सैनिक सिक्योरिटी सर्विसेज की भूमिका भी जांच के दायरे में है। भारतीय स्टेट बैंक द्वारा नियुक्त इस निजी एजेंसी के कर्मचारियों के माध्यम से ही यह हेरफेर संभव हो पाया, जिससे अब बैंक कर्मियों की भूमिका भी संदेह के घेरे में है।