Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
पिछले सत्तर वर्षों की मेहनत के बाद विश्व धरोहर निकला, देखें वीडियो अयोध्या ही भाजपा की लंका बन जाएगीः अखिलेश यादव गिरफ्तारी और इस्तीफा के बाद भी ट्रस्ट की पूरी चुप्पी पीछे हटने को कतई तैयार नहीं है जेन जेड वाले तेलचट्टे नागरिकता नहीं तो पासपोर्ट आखिर क्या हैः थरूर यह कहां आ गये हैं यूंही साथ चलते चलते.. .. .. Gulmarg Accident: बारामूला में शेल फटने से बड़ा हादसा; मृतक की पहचान हुई, प्रशासन ने झूठी खबरों के खि... PM Modi Seychelles Visit: सेशेल्स पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी; हिंद महासागर में भारत की बढ़ेगी र... Delhi BJP Organization: दिल्ली भाजपा ने 11 संगठनात्मक जिलों की नई टीम घोषित की; 33% महिलाओं को मिला ... Delhi Police Controversy: आदर्श नगर में पुलिस सब-इंस्पेक्टर पर महिलाओं को थप्पड़ मारने का आरोप; CCTV...

यह कहां आ गये हैं यूंही साथ चलते चलते.. .. ..

आज का दौर मौन-व्रत का स्वर्णिम युग है। हमारे आसपास क्या हो रहा है, यह जानना आधुनिक नागरिक के लिए एक बोझिल कृत्य है। देश में चारो तरफ सन्नाटा है, लेकिन यह सन्नाटा डरावना नहीं, बल्कि अत्यंत सुसज्जित है। ऐसा लगता है जैसे किसी महान पटकथा लेखक ने तय कर लिया है कि संवाद अब केवल टीवी चैनलों के स्टूडियो में होंगे, हकीकत में तो केवल चुप्पी का संगीत बजेगा।

राम मंदिर में चंदा चोरी की चर्चाएं गलियारों में दबी जुबान से होती हैं, पर वहां भी चुप्पी का पहरा ऐसा है कि जैसे चंदा भगवान का था, सो वे ही जाने! वहां कोई सवाल पूछना आस्था का अपमान है, और आस्था के मामले में हम सब इतने मूक हो चुके हैं कि हमें तो अब अपनी आवाज भी शोर लगने लगी है।

इधर बंगाल की राजनीति में टीएमसी का विभाजन हो रहा है या विघटन, यह समझ से परे है। ममता दीदी के किले में सेंध लग रही है या वह खुद ही अपने महल की ईंटें उखाड़ रही हैं, इस पर भी एक गहरी, दार्शनिक चुप्पी छाई हुई है। यह मौन संकेत है कि सत्ता का खेल इतना जटिल है कि आम आदमी को उसमें उलझना ही नहीं चाहिए।

यह चुप्पी किसी डर से नहीं, बल्कि सुविधा से उपजी है। जब चारों तरफ सब कुछ बिक रहा हो, बदल रहा हो या चोरी हो रहा हो, तो चुप रहना ही सबसे बड़ी कला है। हम एक ऐसे देश में रह रहे हैं जहां सच बोलना अब एक अपराध की श्रेणी में आता है, जबकि चुप्पी एक राष्ट्रीय गुण बन चुकी है। इसी बात पर वर्ष 1981 में बनी इस क्लासिक फिल्म सिलसिला का यह गीत याद आ रहा है। इस गीत को लिखा था जावेद अख्तर ने और संगीत में ढाला था शिव हरि ने। इसे लता मंगेशकर और अमिताभ बच्चन ने अपना स्वर दिया था। गीत को बोल कुछ इस तरह हैं
मैं और मेरी तन्हाई, अक्सर ये बातें करते हैं

तुम होती तो कैसा होता, तुम ये कहती, तुम वो कहती

तुम इस बात पे हैरां होती, तुम उस बात पे कितनी हँसती

तुम होती तो ऐसा होता, तुम होती तो वैसा होता

मैं और मेरी तन्हाई, अक्सर ये बातें करते हैं

रू रू …

ये कहाँ आ गये हम,  यूँही साथ साथ चलते

तेरी बाहों में है जानम, मेरे जिस्म-ओ-जान पिघलते

तेरी बाहों में है जानम, मेरे जिस्म-ओ-जान पिघलते

ये रात है, या तुम्हारी ज़ुल्फ़ें खुली हुई हैं

है चाँदनी तुम्हारी नज़रों से, मेरी राते धुली हुई हैं

ये चाँद है, या तुम्हारा कँगन

सितारे हैं या तुम्हारा आँचल

हवा का झोंका है, या तुम्हारे बदन की खुशबू

ये पत्तियों की है सरसराहट

के तुमने चुपके से कुछ कहा

ये सोचता हूँ मैं कबसे गुमसुम

कि जबकी मुझको भी ये खबर है

कि तुम नहीं हो, कहीं नहीं हो

मगर ये दिल है कि कह रहा है

तुम यहीं हो, यहीं कहीं हो

तू बदन है मैं हूँ साया, तू ना हो तो मैं कहाँ हूँ

मुझे प्यार करने वाले, तू जहाँ है मैं वहाँ हूँ

हमें मिलना ही था हमदम, इसी राह पे निकलते

ये कहाँ आ गये हम

मेरी साँस साँस महके, कोई भीना भीना चन्दन

तेरा प्यार चाँदनी है, मेरा दिल है जैसे आँगन

कोइ और भी मुलायम,  (मेरी शाम ढलते ढलते

कोइ और भी मुलायम,  (मेरी शाम ढलते ढलते

ये कहाँ आ गये हम

मजबूर ये हालात, इधर भी है उधर भी

तन्हाई के ये रात, इधर भी है उधर भी

कहने को बहुत कुछ है, मगर किससे कहें हम

कब तक यूँही खामोश रहें, और सहें हम

दिल कहता है दुनिया की हर इक रस्म उठा दें

दीवार जो हम दोनो में है, आज गिरा दें

क्यों दिल में सुलगते रहें, लोगों को बता दें

हां हमको मुहब्बत है, मोहब्बत है, मोहब्बत है

अब दिल में यही बात, इधर भी है, उधर भी

ये कहाँ आ गये हम, ये कहाँ आ गये हम

झारखंड की ओर रुख करें तो वहां की क्रॉस वोटिंग ने लोकतंत्र के सारे व्याकरण बदल दिए हैं। विधायक का मन कब किस करवट बैठ जाए, यह किसी को नहीं पता। यह क्रॉस वोटिंग है या क्रॉस कनेक्शन, इस पर बहस करना तो समय की बर्बादी है। यहां भी चुप्पी ही एकमात्र सुरक्षित विकल्प है।

और फिर आता है महाराष्ट्र का ऑपरेशन टाइगर। पता नहीं बाघ कहां गया, पिंजरा खाली है या शिकारी खुद ही शिकार हो गया, किसी को कुछ नहीं कहना है। सब जानते हैं कि राजनीति के इस चिड़ियाघर में शेर, बाघ और लोमड़ी के बीच कोई रेखा नहीं बची है। पर हम? हम चुप हैं। हम दर्शक हैं, जो अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर यह तमाशा देख रहे हैं।