हंगरी में नये किस्म का राजनीतिक विवाद उठ खड़ा हुआ
एजेंसियां
बुडापेस्टः हंगरी के प्रधानमंत्री पेटर म्यागर ने सोमवार को संसद को संबोधित करते हुए देश की राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था में बड़े बदलावों का शंखनाद किया है। प्रधानमंत्री म्यागर ने घोषणा की कि उनकी सरकार एक संवैधानिक संशोधन के माध्यम से वर्तमान राष्ट्रपति तामस सुलोक को उनके पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू करेगी। इसके अतिरिक्त, उन्होंने शरद ऋतु में एक व्यापक संवैधानिक सुधार प्रक्रिया शुरू करने की योजना भी साझा की है।
प्रधानमंत्री ने अपने इन सुधारों को ऑपरेशन परगेटरी (शुद्धिकरण अभियान) का नाम दिया है। म्यागर ने जोर देकर कहा कि हंगरी को भ्रष्टाचार के चंगुल से मुक्त करना उनकी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। इसके लिए सरकार 47 कानूनों में संशोधन करने जा रही है, जिसका मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय संपत्ति संरक्षण और पुनर्प्राप्ति कार्यालय का गठन करना है।
यह नया निकाय पिछले दो दशकों के दौरान सार्वजनिक धन के कथित दुरुपयोग और भ्रष्टाचार की विस्तृत जांच करेगा। म्यागर का दावा है कि भ्रष्टाचार के कारण हंगरी को हाल के वर्षों में अपने सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 8 प्रतिशत से 10 प्रतिशत तक नुकसान उठाना पड़ा है।
इस राजनीतिक हलचल के केंद्र में राष्ट्रपति तामस सुलोक हैं। म्यागर ने सुलोक पर आरोप लगाया है कि वे दक्षिणपंथी पूर्व नेता विक्टर ओर्बन के शासन को परोक्ष रूप से समर्थन दे रहे थे। हालांकि, राष्ट्रपति सुलोक ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि उनका कोई राजनीतिक एजेंडा नहीं रहा है और उन्होंने केवल संवैधानिक दायित्वों का पालन करते हुए संतुलन बनाए रखने का कार्य किया है। वहीं, पूर्व सत्तारूढ़ पार्टी फिडेज के सांसद गेरगेली गुल्यास ने म्यागर के भाषण को मानहानिकारक और भयावह करार दिया है।
राष्ट्रपति सुलोक को हटाने के लिए संवैधानिक प्रक्रिया शुरू की जाएगी, जिसके बाद संसद द्वारा अधिकतम पांच साल के कार्यकाल के लिए नए राष्ट्रपति का चुनाव किया जाएगा। शरद ऋतु से व्यापक संवैधानिक समीक्षा शुरू की जाएगी, जिसमें सार्वजनिक परामर्श भी शामिल होंगे। अंतिम रूप से तैयार किए गए नए संविधान को जनमत संग्रह के लिए जनता के समक्ष रखा जाएगा। संवैधानिक न्यायालय के जजों के लिए सेवानिवृत्ति की आयु सीमा 70 वर्ष तय की जाएगी। इससे ओर्बन के करीबी माने जाने वाले मुख्य न्यायाधीश पीटर पोल्ट को सेवानिवृत्त होना पड़ेगा। साथ ही, अब संसद में दो-तिहाई बहुमत के समर्थन से सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय न्यायिक कार्यालय के प्रमुखों को हटाने का अधिकार प्राप्त होगा।