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अंडा संस्कृति और गहराता राजनीतिक संकट

हाल ही में कोलकाता के हवाई अड्डे पर जो घटनाक्रम देखने को मिला, वह भारतीय राजनीति में बढ़ती असहिष्णुता और पतनशील राजनीतिक संस्कृति का एक दुखद प्रतिबिंब है। टीएमसी नेता अभिषेक बनर्जी की वापसी के ठीक पहले जिस तरह से भाजपा और टीएमसी समर्थकों के बीच हिंसक झड़प हुई, उसने न केवल सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या हमारा लोकतंत्र अब केवल अंडा फेंकने और हिंसा के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गया है।

हवाई अड्डे पर हुई इस झड़प के केंद्र में एक लाल रंग की थार गाड़ी थी, जिसमें सवार युवक और युवतियां अपने साथ अंडे लेकर आए थे। इस प्रतीकात्मक और हिंसक कृत्य का अर्थ स्पष्ट था—अभिषेक बनर्जी को निशाना बनाना। यह कोई पहली घटना नहीं है। इससे पहले भी अभिषेक बनर्जी पर अंडा हमले की घटनाएं हो चुकी हैं, जिनमें भाजपा कार्यकर्ताओं की संलिप्तता का आरोप और प्रमाण सामने आते रहे हैं।

अंडा लेकर आने वालों को टीएमसी समर्थकों ने न केवल घेरा, बल्कि उनके साथ मारपीट भी की। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर जंगल की आग की तरह फैल गया है, जो राज्य की बिगड़ती राजनीतिक फिजा को दर्शा रहा है। राजनीति में विरोध के कई तरीके हो सकते हैं, लेकिन अंडा संस्कृति का पनपना किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए खतरनाक संकेत है।

यह केवल एक राजनीतिक विरोध नहीं है, बल्कि एक अपराधीकरण की मानसिकता है। जब हम अपनी असहमति को तर्कों या नीतिगत विरोध के बजाय शारीरिक हमले, अपमान या अंडे फेंकने जैसे निम्न स्तर के कार्यों से प्रदर्शित करते हैं, तो हम राजनीति के उस बुनियादी ढांचे को ध्वस्त कर रहे होते हैं जिसे पूर्वजों ने काफी मशक्कत से बनाया था।

यह संस्कृति इस बात का प्रमाण है कि वैचारिक बहस की जगह अब सड़क छाप गुंडागर्दी ने ले ली है। यदि इस पर समय रहते अंकुश नहीं लगाया गया, तो यह अराजकता किसी बड़े और भीषण संघर्ष को जन्म दे सकती है। हवाई अड्डे जैसा संवेदनशील स्थान, जो राज्य का प्रवेश द्वार माना जाता है, वहां इस प्रकार की हिंसक घटनाएं राज्य की कानून-व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती हैं।

राजनीतिक विश्लेषण की दृष्टि से देखें तो बंगाल की वर्तमान स्थिति काफी जटिल है। एक सच्चाई यह भी है कि चुनाव में बेहतर प्रदर्शन के बावजूद भाजपा के पास अपने समर्पित कैडर और समर्थकों का घोर अभाव है। राज्य की राजनीति में भाजपा की धुरी उन लोगों पर टिकी है जो कभी सीपीएम या अन्य दलों में थे और अब मजबूरी या सत्ता समीकरणों के कारण भाजपा का झंडा थामे हुए हैं।

यह दलबदलू संस्कृति भाजपा को जमीनी स्तर पर वह मजबूती नहीं दे पा रही है, जिसकी अपेक्षा एक राष्ट्रीय दल से की जाती है। इसके विपरीत, टीएमसी (तृणमूल कांग्रेस) के पास गांव-गांव और मोहल्ले-मोहल्ले तक समर्थकों की एक संगठित और बड़ी फौज है। टीएमसी की सबसे बड़ी ताकत उसकी जमीनी पैठ है, जो राज्य के हर हिस्से में फैली हुई है।

भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अंडा संस्कृति जैसे हथकंडों के माध्यम से टीएमसी के इस विशाल जनाधार को चुनौती देने का प्रयास कर रही है, जो कि न केवल व्यर्थ है बल्कि आत्मघाती भी हो सकता है। राज्य में सरकार बदलने के बाद जिस तरह से हिंसक घटनाओं की पुनरावृत्ति हो रही है, वह एक बड़े टकराव की आहट है।

अंडा संस्कृति ने राजनीतिक विरोध को निजी प्रतिशोध में बदल दिया है। यदि राजनीतिक दल अपनी इस उग्रवादी कार्यशैली को नहीं छोड़ते, तो आम नागरिक पिसेंगे। पुलिस और प्रशासन को भी अपनी निष्पक्षता साबित करनी होगी। हवाई अड्डे पर हुई पिटाई के वीडियो ने यह दिखा दिया है कि हिंसा की आंच अब किसी को नहीं छोड़ रही है।

अंततः, राजनीति में अंडा फेंकने की संस्कृति से हर किसी को बचना चाहिए। यह संस्कृति न तो किसी दल को सत्ता दिला सकती है और न ही किसी नेता की लोकप्रियता में वृद्धि कर सकती है। यह केवल समाज में नफरत का जहर घोलती है और युवाओं को गलत रास्ता दिखाती है। बंगाल की राजनीतिक गरिमा एक लंबी परंपरा से जुड़ी रही है, जिसे इन छोटी और तुच्छ हरकतों से नहीं तोलना चाहिए।

सभी राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि बंगाल की जनता विकास, रोजगार और शांति चाहती है, न कि हवाई अड्डों पर अंडे की राजनीति। समय आ गया है कि इस अंडा संस्कृति का पूरी तरह से बहिष्कार किया जाए, वरना आने वाला समय एक बड़े संघर्ष का गवाह बनेगा, जिसकी कीमत राज्य के विकास को चुकानी होगी। लोकतंत्र का सार संवाद में है, संघर्ष में नहीं। इसलिए, सभी पक्षों को संयम बरतना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में किसी भी हवाई अड्डे या सार्वजनिक स्थल पर ऐसी शर्मनाक घटनाएं दोबारा न घटें।