तृणमूल कांग्रेस में ममता बनर्जी की राजनीतिक अग्निपरीक्षा
तृणमूल—शाब्दिक अर्थ में घास की जड़ और राजनीतिक संदर्भ में एक जनांदोलन का प्रतीक। जिस पार्टी का उदय वामपंथी शासन के तीन दशक लंबे दमन के विरुद्ध एक वैचारिक क्रांति के रूप में हुआ था, आज वह पार्टी अपनी ही आंतरिक कलह और अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। सिंगूर और नंदीग्राम की माटी से उठकर पश्चिम बंगाल की सत्ता के शिखर तक पहुँचने वाली ममता बनर्जी की यह तृणमूल कांग्रेस आज तीन टुकड़ों में विभाजित दिखती है, जहाँ तृण (सांसद) कहीं और जा रहे हैं, मूल (विधायक) बागी सुर अलाप रहे हैं और कांग्रेस (मूल विचार) ममता बनर्जी के इर्द-गिर्द सिमटने को मजबूर है।
ममता बनर्जी का संघर्ष मात्र एक चुनावी यात्रा नहीं थी, बल्कि यह बंगाल के उन उपेक्षित और शोषित तबकों की आवाज थी, जिन्होंने वामपंथी शासनकाल में अत्याचार सहे थे। सिंगूर के कारखाने और नंदीग्राम के किसान आंदोलन ने ममता को दीदी के रूप में एक ऐसी जननेता बनाया, जो न झुकती थी और न रुकती थी। उस समय तृणमूल कांग्रेस का गठन ग्रासरूट (जड़) से जुड़े कार्यकर्ताओं को एक मंच देने के लिए किया गया था। लेकिन, सत्ता की सीढ़ियाँ चढ़ते ही पार्टी का चरित्र बदलने लगा।
आज उसी पार्टी के गलियारों में जो सन्नाटा और बिखराव है, वह इस बात का परिचायक है कि कैसे एक वैचारिक आंदोलन धीरे-धीरे सत्तालोलुप राजनीति की भेंट चढ़ गया। वर्तमान घटनाक्रम यह दर्शाता है कि पार्टी के 20 सांसदों का नेशनल सिटिजन पार्टी ऑफ इंडिया में विलय महज एक तकनीकी दलबदल नहीं, बल्कि एक गहरे राजनीतिक दरार का परिणाम है।
यह तृण यानी पार्टी के उन सांसदों का जाना है जिन्होंने हवा का रुख भांपकर दूसरी नाव पर सवार होना बेहतर समझा। वहीं दूसरी ओर, विधानसभा में ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाला बागी गुट यह स्पष्ट कर रहा है कि मूल (विधायक दल) अभी भी ममता की नीतियों से पूरी तरह सहमत नहीं है। यह विभाजन संसदीय प्रक्रिया में ममता बनर्जी की ताकत को कमजोर कर रहा है। केंद्र की राजनीति में तृणमूल की जो धमक कभी हुआ करती थी, वह अब सांसदों की घटती संख्या के साथ फीकी पड़ती जा रही है।
ममता बनर्जी की व्यक्तिगत साख और उनकी सादगी पर आज भी कोई उंगली नहीं उठा सकता, लेकिन पार्टी के भीतर सत्ता के दलालों ने जो मायाजाल बुना है, उसने ममता की मेहनत पर पानी फेर दिया है। पार्टी पर भ्रष्टाचार के जो आरोप लगे, उसने आम जनता के बीच उस छवि को धूमिल कर दिया, जिसे बनाने में दशकों लगे थे। आज जनता के चेहरे पर जो सवाल है, वह केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि नैतिक भी है। क्या वह नेता, जिसे उन्होंने दीदी मानकर सिर आंखों पर बैठाया था, वाकई उन लोगों को नियंत्रित करने में विफल रही है जो पार्टी के नाम पर अपना उल्लू सीधा कर रहे थे?
सबसे बड़ा और यक्ष प्रश्न यह है कि क्या ममता से अलग हुए ये धड़े बिना ममता बनर्जी के चेहरे के भविष्य में कोई चुनाव जीत पाएंगे? भारतीय राजनीति का इतिहास गवाह है कि जो दल ममता के प्रभाव और उनके करिश्मे से अलग हुए, वे या तो हाशिए पर चले गए या उनका अस्तित्व ही समाप्त हो गया। ममता बनर्जी का चेहरा बंगाल की राजनीति की वह धुरी है, जिसके बिना किसी भी गुट का अपनी पहचान बनाना टेढ़ी खीर है। बागी सांसदों और विधायकों का यह मानना कि वे पार्टी के नाम और चिह्न पर दावा ठोक सकते हैं, शायद उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक भूल है।
वे भूल रहे हैं कि तृणमूल कांग्रेस का अर्थ केवल एक चुनावी चिन्ह नहीं, बल्कि ममता बनर्जी नाम का वह भरोसा है जिसने बंगाल के लोगों के बीच अपनी जगह बनाई है। यह बिखराव उन्हें अस्थायी सुरक्षा तो दे सकता है, लेकिन जनता के बीच उन्हें गद्दार या अवसरवादी के ठप्पे से बचाना उनके लिए संभव नहीं होगा। ममता बनर्जी की राजनीतिक सूझबूझ को कमतर नहीं आंका जा सकता। उन्होंने ऐसे कई तूफानों का सामना किया है जहाँ उन्हें पूरी तरह से खत्म मान लिया गया था।
अंततः, बंगाल की जनता ही तय करेगी कि यह तृणमूल का अंत है या उसकी शुद्धिकरण की प्रक्रिया। यदि बागी गुट यह सोचता है कि वे ममता के बिना अपनी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा सकते हैं, तो यह उनकी भारी भूल होगी। राजनीति में चेहरे बदलते हैं, दल बनते और बिगड़ते हैं, लेकिन जो दल अपने मूल से कट जाता है, उसकी जड़ें सूखने में देर नहीं लगती। ममता बनर्जी अभी भी बंगाल की राजनीति में उस वृक्ष की तरह हैं जिसकी छाया ही इन बागियों को पहचान दिलाती थी। अब देखना यह है कि यह जड़ का कांग्रेस आगामी चुनावी मौसम में खुद को कैसे फिर से खड़ा करता है।