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देश की विपक्षी एकता इंडिया गठबंधन में दरार

केंद्र में भाजपा का विरोध करे कांग्रेस पर राज्य में जगह नहीं

  • कांग्रेस दिल्ली में भाजपा के खिलाफ लड़े

  • चुनावों में क्षेत्रीय दलों का घटता प्रभाव

  • सभी को अपने वोट बैंक की चिंता है

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः मई का यह महीना विपक्षी खेमे के लिए एक बड़ी और गहरी आंतरिक निराशा लेकर आया है। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के प्रमुख एम.के. स्टालिन और तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ममता बनर्जी को मिले हालिया राजनीतिक झटकों, और इसके साथ ही तमिलनाडु में कांग्रेस द्वारा किए गए नए राजनीतिक फेरबदल ने इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव एलायंस यानी इंडिया गठबंधन के भविष्य पर अनिश्चितता और संकट के गहरे बादल मंडरा दिए हैं।

इंडिया गठबंधन के भीतर चल रही यह आंतरिक खींचतान भारतीय राजनीति के एक बेहद जटिल समीकरण को उजागर करती है। गठबंधन में शामिल अधिकांश क्षेत्रीय दलों की मुख्य चिंता यह है कि राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय जनता पार्टी का मुकाबला करने के लिए केंद्र में एक मजबूत कांग्रेस का होना तो आवश्यक है, लेकिन वे अपने-अपने राज्यों के भीतर कांग्रेस को मजबूत करने के लिए अपनी राजनीतिक जमीन छोड़ने को कतई तैयार नहीं हैं।

गठबंधन में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब तमिलनाडु में कांग्रेस ने अपनी राजनीतिक रणनीति में बदलाव करने के संकेत दिए। अब तक तमिलनाडु में कांग्रेस पूरी तरह से डीएमके के नेतृत्व पर निर्भर थी और जूनियर पार्टनर की भूमिका में थी। लेकिन कांग्रेस के इस नए राजनीतिक रुख ने द्रमुक नेतृत्व को असहज कर दिया है। क्षेत्रीय दलों को हमेशा यह डर सताता है कि यदि कांग्रेस राज्यों में मजबूत हुई, तो वह उनके पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगा देगी।

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के बीच का मतभेद किसी से छुपा नहीं है। ममता बनर्जी लगातार यह रुख अपनाती रही हैं कि जिन राज्यों में क्षेत्रीय दल मजबूत हैं, वहाँ कांग्रेस को पीछे हट जाना चाहिए और केवल उन्हीं सीटों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जहाँ उसका सीधा मुकाबला भाजपा से है। दूसरी ओर, कांग्रेस खुद को एक राष्ट्रीय पार्टी के रूप में देखती है और वह राज्यों में अपनी उपस्थिति को पूरी तरह समाप्त करने के पक्ष में नहीं है।

जैसे-जैसे राजनीतिक परिदृश्य बदल रहा है, इंडिया गठबंधन के सामने अपनी आंतरिक एकजुटता को बचाए रखने की एक बहुत बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। भाजपा के अजेय रथ को रोकने के लिए बनाए गए इस मोर्चे के भीतर का यह आंतरिक असंतोष और अविश्वास यह साफ दिखाता है कि केंद्र में एक मजबूत विकल्प बनने की राह में सबसे बड़ा रोड़ा राज्यों में सीटों का बंटवारा और क्षेत्रीय वर्चस्व की लड़ाई ही है। यदि समय रहते इन अंतर्विरोधों को नहीं सुलझाया गया, तो इस गठबंधन का भविष्य पूरी तरह से अंधकारमय हो सकता है।