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टीएमसी के बाद यूबीटी पर निशाना साध रही है भाजपा

संसद में संख्याबल बढ़ाने की कवायद जारी

  • छह सांसदों की चर्चा होने लगी

  • दलबदल कानून से बचना भी है

  • संसद में दो तिहाई बहुमत का प्रयास

राष्ट्रीय खबर

नई दिल्ली: केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार लोकसभा में अपनी संख्या बल को और मजबूत करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है। ताजा राजनीतिक चर्चाओं के अनुसार, अब महाराष्ट्र की शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) में भी विभाजन की सुगबुगाहट तेज हो गई है। टीएमसी के बाद अब एनडीए की नजरें उद्धव ठाकरे के खेमे पर टिकी हैं, जिससे सरकार को अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी समर्थन मिल सकता है।

सूत्रों का कहना है कि शिवसेना (यूबीटी) के नौ लोकसभा सांसदों में से कम से कम छह सांसदों के पाला बदलने की संभावना है। दल-बदल विरोधी कानून के पचड़े से बचने के लिए, इन बागी सांसदों को अपनी पार्टी का विलय किसी अन्य दल में करना होगा, जिसमें एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना सबसे संभावित विकल्प के रूप में देखी जा रही है। महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में मिली शानदार जीत के बाद एकनाथ शिंदे का जमीनी स्तर पर प्रभाव काफी बढ़ा है, जबकि उद्धव ठाकरे का प्रभाव मुख्य रूप से मुंबई तक सीमित रह गया है।

शिवसेना के इन घटनाक्रमों के साथ-साथ, तृणमूल कांग्रेस के एक बागी धड़े ने भी भाजपा नेतृत्व को समर्थन देने के लिए 19 सांसदों के हस्ताक्षर सौंपने का दावा किया है। एनडीए सरकार का मुख्य लक्ष्य मौजूदा 540 सदस्यीय लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत (360 के जादुई आंकड़े) के करीब पहुँचना है। पिछले संसदीय सत्र में संविधान संशोधन से जुड़े महत्वपूर्ण विधेयक विशेष बहुमत न होने के कारण पारित नहीं हो सके थे, जिसके बाद से ही सरकार विपक्षी खेमे के असंतुष्ट सांसदों को अपने पाले में लाने की आक्रामक रणनीति पर काम कर रही है।

सरकार का मुख्य फोकस भविष्य में परिसीमन विधेयक और अन्य संवैधानिक सुधारों को पारित कराना है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि एनडीए की यह रणनीति सफल रहती है, तो संसद में सरकार की स्थिति अत्यंत मजबूत हो जाएगी। विपक्षी दल इसे ऑपरेशन का हिस्सा बता रहे हैं, जबकि सत्ता पक्ष इसे सामान्य राजनीतिक घटनाक्रम के रूप में देख रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या शिवसेना (यूबीटी) का यह कथित धड़ा वाकई एनडीए का हिस्सा बनता है या उद्धव ठाकरे अपनी पार्टी को इस संभावित बिखराव से बचाने में कामयाब होते हैं।