कानूनी तौर पर बहुत बुरा फंस गया है राज्यसभा चुनाव का पेंच
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अदालत चाहे तो चुनाव खारिज कर देगा
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नामांकन खारिज का आधार कमजोर है
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अब तो वह मामला ही खत्म हो गया है
राष्ट्रीय खबर
भोपालः मध्य प्रदेश से कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन के राज्यसभा नामांकन के खारिज होने का मामला चुनाव प्रक्रिया के दौरान रिटर्निंग ऑफिसर के अधिकारों और नामांकन पत्रों की सूक्ष्म जांच के दायरे को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी बहस का केंद्र बन गया है। सुप्रीम कोर्ट ने नटराजन की याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद अदालतें सामान्यतः इसमें हस्तक्षेप नहीं करती हैं और इसके लिए चुनाव याचिका दायर करना ही उचित कानूनी उपचार है।
लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 80 के अनुसार, किसी भी चुनाव को केवल चुनाव याचिका के माध्यम से ही चुनौती दी जा सकती है। धारा 80ए के तहत उच्च न्यायालय को ऐसी याचिकाओं की सुनवाई का अधिकार है। पराजित उम्मीदवार चुनाव परिणाम की घोषणा के 45 दिनों के भीतर यह याचिका दायर कर सकता है। अधिनियम की धारा 100(1)(सी) स्पष्ट करती है कि यदि किसी उम्मीदवार का नामांकन गलत तरीके से खारिज किया गया है, तो अदालत उस चुनाव को शून्य घोषित कर सकती है।
मीनाक्षी नटराजन का नामांकन तब खारिज किया गया जब भाजपा ने शिकायत की कि उन्होंने हैदराबाद की एक अदालत में लंबित निजी शिकायत के बारे में अपने फॉर्म 26 में जानकारी नहीं दी। रिटर्निंग ऑफिसर अरविंद शर्मा ने माना कि अदालत ने मामले का संज्ञान लिया है और नटराजन ने वहां जवाब भी दाखिल किया है, इसलिए यह जानकारी छिपाना नामांकन रद्द करने का आधार बना।
मध्यप्रदेश विधानसभा के पूर्व प्रधान सचिव और अनुभवी रिटर्निंग ऑफिसर भगवददेव इसरानी के अनुसार, नामांकन खारिज करना कोई यांत्रिक प्रक्रिया नहीं होनी चाहिए। उनके तर्क है कि चुनाव आयोग की नियमावली का पैरा 6(6) कहता है कि प्रत्येक नामांकन पत्र को तब तक वैध माना जाना चाहिए जब तक कि उसकी अवैधता स्पष्ट न हो। यदि नामांकन की वैधता पर उचित संदेह हो, तो उसका लाभ उम्मीदवार को मिलना चाहिए।
तकनीकी खामियां: नियमावली के पैरा 9(1) के अनुसार, किसी भी ऐसे दोष के आधार पर नामांकन खारिज नहीं करना चाहिए जो पूरी तरह सत्य न हो। मामूली या लिपिकीय गलतियों को नजरअंदाज किया जाना चाहिए। शपथ पत्र के नियम: हालांकि पैरा 10(13) में कहा गया है कि अधूरे शपथ पत्र खारिज किए जा सकते हैं, लेकिन इसरानी का तर्क है कि इसे पैरा 10(12) के साथ पढ़ा जाना चाहिए, जो कहता है कि यदि शपथ पत्र में त्रुटि है, तो उसे केवल उसी आधार पर खारिज नहीं किया जाना चाहिए। आरओ को यह देखना चाहिए कि क्या वह दोष सुधारा जा सकता है और क्या उम्मीदवार को मौका दिया गया था।
आपराधिक मामलों का प्रकटीकरण: लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 33ए के तहत प्रकटीकरण तभी अनिवार्य है जब अपराध दो साल से अधिक कारावास की सजा वाला हो और अदालत द्वारा आरोप तय कर दिए गए हों। इसरानी का दावा है कि इस मामले में अभी तक कानूनी रूप से अपराध का संज्ञान ही नहीं लिया गया था, अतः जानकारी छिपाने का आरोप तकनीकी रूप से कमजोर हो सकता है। यह मामला अब इस बात पर निर्भर करता है कि क्या उच्च न्यायालय इस बात पर गौर करेगा कि रिटर्निंग ऑफिसर द्वारा की गई नामांकन की अस्वीकृति सारवान थी या केवल तकनीकी खामियों पर आधारित एक यांत्रिक निर्णय।