ध्यान भटकाने वाला तमाशा और जिम्मेदारी से भागती सरकार
देश में इन दिनों सोशल मीडिया पर एक अजीबोगरीब और सुनियोजित ड्रामा देखने को मिल रहा है। एक तरफ कथित मुख्यधारा के टीवी चैनलों के कुछ जाने-माने चेहरे हैं, तो दूसरी तरफ करोड़ों के टर्नओवर पर चल रहे निजी कोचिंग संस्थानों के नामी शिक्षक। हाल ही में एक महिला एंकर द्वारा अचानक कोचिंग संचालकों की निंदा किए जाने के बाद सोशल मीडिया पर जैसी जंग छिड़ी, उसने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
लेकिन अगर इस पूरे विवाद की परतों को थोड़ा गहरा उतरकर देखा जाए, तो क्रोनोलॉजी साफ हो जाती है। यह पूरा बखेड़ा दरअसल देश के सबसे बड़े छात्र आंदोलन और राष्ट्रीय संकट नीट पेपर लीक—से जनता और मीडिया का ध्यान भटकाने की एक सोची-समझी साजिश से ज्यादा कुछ नहीं लगता। विवाद शुरू होते ही कोचिंग चलाने वाले शिक्षक भी पूरी तैयारी के साथ मैदान में उतर आए और उन्होंने एंकर की जमकर फजीहत की।
सोशल मीडिया पर लाइक, शेयर और व्यूज की इस टीआरपी जंग में दोनों पक्षों ने एक-दूसरे को खूब नीचा दिखाया। लेकिन इस शोर-शराबे और नूराकुश्ती के बीच जो सबसे बुनियादी और तीखा सवाल था, वह कहीं पीछे छूट गया और अनुत्तरित रह गया, आखिर इस देश के लाखों होनहार युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले पेपर लीक की जिम्मेदारी कौन लेगा?
इस पूरे घटनाक्रम में देश के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की भूमिका बेहद निराशाजनक रही है। ऐसा प्रतीत होता है कि वह इन दिनों मुख्यधारा के मीडिया और कैमरों से बचते फिर रहे हैं। उनका यह डर अस्वाभाविक नहीं है; उन्हें अच्छी तरह पता है कि अगर कैमरे के सामने किसी निष्पक्ष पत्रकार या पीड़ित छात्र ने कड़वा सवाल पूछ दिया, तो सरकार के पास देने के लिए कोई ठोस जवाब नहीं है। वैसे, साख और नैतिक जिम्मेदारी के मोर्चे पर तो शिक्षा मंत्री की फजीहत पहले ही हो चुकी है, लेकिन अब इस विवाद के लगातार खिंचने से जो साख दांव पर लगी है, वह सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की है।
‘परीक्षा पे चर्चा’ करने वाले शीर्ष नेतृत्व का ऐसे गंभीर संकट के समय मौन साध लेना या ध्यान भटकाने वाले विवादों को हवा देना बेहद चिंताजनक है। इस पूरे विवाद के बीच एक और अधिक गंभीर और संरचनात्मक सवाल उठता है कि आखिर हमारे देश में निजी कोचिंग संस्थानों की जरूरत पड़ती ही क्यों है? क्यों माता-पिता को अपनी गाढ़ी कमाई का एक बड़ा हिस्सा इन कोचिंग सेंटरों की जेबों में डालना पड़ता है? इस सवाल का सीधा संबंध हमारे सरकारी स्कूली शिक्षा तंत्र की रीढ़हीनता से है। अगर सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का स्तर बेहतर और प्रतिस्पर्धी हो, तो किसी भी बच्चे को कोचिंग के चक्रव्यूह में फंसने की जरूरत नहीं पड़ेगी। सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को मिलने वाला वेतन किसी भी निजी स्कूल या औसत संस्थान से कम नहीं होता, उन्हें बेहतरीन सुविधाएं और सुरक्षा मिलती है। कमी वेतन की नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक जवाबदेही की है।
कोई भी पारंपरिक सरकार उन स्कूलों में पढ़ाई का स्तर वैश्विक या प्रतिस्पर्धी बनाने पर ध्यान ही नहीं देती। सरकारी स्कूलों के कायाकल्प और शिक्षा के स्तर में सुधार से क्या बड़ा बदलाव आ सकता है, इसका एक व्यावहारिक उदाहरण हम दिल्ली में आम आदमी पार्टी के शासनकाल में शिक्षा मॉडल के रूप में देख चुके हैं। जब सरकारी स्कूलों के बुनियादी ढांचे को सुधारा गया, शिक्षकों को विदेशों में ट्रेनिंग के लिए भेजा गया और शिक्षा को बजट की प्राथमिकता बनाया गया, तो वहां के नतीजों ने निजी स्कूलों को टक्कर दी। यह इस बात का सबूत है कि अगर सरकारें चाहें, तो शिक्षा व्यवस्था को बदला जा सकता है।
दूसरी तरफ, देश में कुकुरमुत्ते की तरह उग आए अत्यंत महंगे, आलीशान और फाइव-स्टार सुविधाओं वाले निजी स्कूलों के मालिकों के चरित्र पर कभी मुख्यधारा में चर्चा नहीं होती। इन शानदार स्कूलों के पीछे देश के रसूखदार राजनेता, बड़े नौकरशाह और कॉरपोरेट घराने शामिल हैं, जिन्होंने शिक्षा को एक पवित्र सेवा से बदलकर मुनाफे का एक सबसे सुरक्षित धंधा बना दिया है।
जब तक सरकारी शिक्षा व्यवस्था को जानबूझकर पंगु बनाकर रखा जाएगा, तब तक इन महंगे निजी स्कूलों और करोड़ों का कारोबार करने वाले कोचिंग संस्थानों की दुकानें चमकती रहेंगी। टीवी एंकरों और कोचिंग शिक्षकों के बीच का यह सोशल मीडिया युद्ध दरअसल एक ध्यान भटकाने वाली रणनीति है, ताकि देश की जनता नीट पेपर लीक, भ्रष्ट परीक्षा प्रणाली और नेशनल टेस्टिंग एजेंसी की नाकामियों पर सरकार से तीखे सवाल न पूछे। दिक्कत है कि इसके बीच ही अचानक से कॉकरोच उग आये हैं और तेजी से बढ़ते ही जा रहे हैं। अब उन्हें संभालने के लिए नया तरीका तलाशना पड़ेगा। पढ़े लिखे युवा हैं, आसानी से भटकाना संभव नहीं होगा।