तृणमूल कांग्रेस में ऐतिहासिक बगावत का हस्ताक्षर अभियान जारी
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तीनों नेताओँ ने चुप्पी साध रखी है
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पत्र में उनके हस्ताक्षर का खंडन नहीं
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भाजपा में विलय शायद नहीं होगा इनका
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः तृणमूल कांग्रेस के भीतर जारी आंतरिक राजनीतिक घमासान अब और गहरा गया है और यह संकट अब कोलकाता की सड़कों से निकलकर देश की संसद तक पहुंच चुका है। सूत्रों के हवाले से बुधवार को आई बेहद चौंकाने वाली खबरों के अनुसार, पार्टी के 19 लोकसभा सांसदों ने एक बगावती सूची पर अपने हस्ताक्षर कर दिए हैं। इस बगावती सूची में पूर्व क्रिकेटर यूसुफ पठान, युवा नेता सायोनी घोष और दिग्गज अभिनेता व राजनेता शत्रुघ्न सिन्हा जैसे कई हाई-प्रोफाइल और प्रमुख चेहरे शामिल हैं। सांसदों के इस अभूतपूर्व कदम के बाद ऐसा प्रतीत हो रहा है कि तृणमूल कांग्रेस अब एक बड़े और सीधे विभाजन की ओर तेजी से बढ़ रही है।
संसदीय दल के भीतर हुई यह अभूतपूर्व बगावत और इसके साथ ही पश्चिम बंगाल विधानसभा में विधायकों द्वारा किए गए बड़े विद्रोह ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के राजनीतिक जीवन का सबसे गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। पार्टी की स्थापना के बाद से अब तक ममता बनर्जी की सर्वोच्च सत्ता और नेतृत्व को इतनी बड़ी चुनौती कभी नहीं मिली थी।
इस राजनीतिक भूकंप का असर न केवल कोलकाता की राज्य राजनीति पर बल्कि नई दिल्ली के संसदीय समीकरणों पर भी हमेशा के लिए गहरा प्रभाव डाल सकता है। वर्तमान में लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस के कुल 28 सांसद हैं, जिसमें बशीरहाट के सांसद हाजी नूरुल इस्लाम के निधन के बाद एक सीट अभी खाली है। इस ताजा और बड़ी बगावत के बाद, सदन के भीतर ममता बनर्जी का प्रभावी समर्थन आधार घटकर महज 9 सांसदों तक सिमट गया है, जो पार्टी आलाकमान के लिए एक बहुत बड़ा झटका है।
इस बागी गुट के सांसदों ने फिलहाल तृणमूल कांग्रेस से तुरंत इस्तीफा न देने और न ही औपचारिक रूप से भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने का एक बेहद रणनीतिक फैसला किया है। इसके बजाय, इन असंतुष्ट सांसदों की योजना संसद के भीतर एक अलग गुट के रूप में कार्य करने और बाहर से राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार को अपना समर्थन देने की है।
सांसदों का यह कदम स्पष्ट रूप से दल-बदल विरोधी कानून के तहत अपनी सदस्यता रद्द होने या अयोग्य घोषित होने के कानूनी खतरे से बचने के लिए उठाया गया है। हालांकि, कानूनी जानकारों का यह भी मानना है कि चूंकि इस बागी गुट के पास 19 सांसदों का समर्थन प्राप्त है, जो लोकसभा में पार्टी की कुल ताकत (28 सांसद) के दो-तिहाई से भी अधिक है, इसलिए यह गुट वैसे भी दल-बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता की कार्रवाई से आसानी से बच सकता है।