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भाजपा में भी राज्यसभा के दावेदारों की कमी नहीं

तीन नाम भेजे गये पर फैसला बदलेगा

  • अतिरिक्त वोट जुटाने की जरूरत होगी

  • सत्ताधारी गठबंधन से वोट कौन लेगा

  • कांग्रेस से अनबन का लाभ कैसे लें

राष्ट्रीय खबर

रांचीः झारखंड भाजपा के प्रदेश कार्यालय पर बाहर से गौर करने से पता चलता है कि कम खर्च करने के प्रधानमंत्री मोदी के निर्देश का यहां कोई असर नहीं पड़ा है। कार्यालय के बाहर लगी गाड़ियों की भीड़ यही संकेत देती है। अलबत्ता कुछ समझदार लोग सड़क के दूसरी छोर पर अपनी बड़ी बड़ी गाड़ियां खड़ी कर कार्यालय जाते हैं। असली भीड़भाड़ की वजह राज्य सभा का चुनाव है। जिसमें भीड़ लगाने वाले कोई भी सीरियस कैंडिडेंट नहीं है। राज्यसभा चुनाव में विधायकों की दलगत स्थिति जैसी है उसमें शायद भाजपा के पास एकमात्र अर्जुन मुंडा एकमात्र खिलाड़ी है जो विपक्ष की घेराबंदी को भेदकर गोल कर सकते हैं। दिल्ली में तीन नाम भेजे गये हैं पर उनपर क्या फैसला होगा, यह प्रदेश के नेताओं को भी पता नहीं है।

झारखंड की वर्तमान राजनीतिक तस्वीर राज्य विधानसभा में दलों की स्थिति और आगामी राज्यसभा चुनावों के समीकरणों के इर्द-गिर्द केंद्रित है। 81 सदस्यीय झारखंड विधानसभा में वर्तमान में सत्ताधारी महागठबंधन और विपक्षी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के बीच स्पष्ट विभाजन दिखाई देता है।

वर्तमान आंकड़ों के अनुसार, महागठबंधन के पास कुल 56 सीटें हैं, जिनमें झारखंड मुक्ति मोर्चा के पास 34, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पास 16, राष्ट्रीय जनता दल के पास 4 और भाकपा (माले) के पास 2 सीटें हैं। दूसरी ओर, मुख्य विपक्षी गठबंधन एनडीए के पास कुल 25 सीटें हैं, जिसमें भारतीय जनता पार्टी की 21 सीटें शामिल हैं, इसके अलावा आजसू, जद (यू) और लोजपा (रामविलास) का एक-एक विधायक है। शेष एक सीट झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा के पास है। इस बहुमत के साथ, राज्य में हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली सरकार काफी मजबूत स्थिति में है।

एक सीट जीतने के लिए 28 विधायकों के प्रथम वरीयता मतों की आवश्यकता होती है। अब भाजपा खेमा की तरफ से महागठबंधन से क्रॉस वोटिंग का गुण अकेले अर्जुन मुंडा के पास ही है पर केंद्रीय नेतृत्व का फैसला क्या होगा, यह लाख टके का सवाल है। स्पष्ट बहुमत के चलते, महागठबंधन के लिए राज्यसभा की सीटों पर अपना कब्जा बनाए रखना गणितीय रूप से आसान बना हुआ है।

हालांकि, दलगत निष्ठा और क्रॉस-वोटिंग की संभावना हमेशा इन चुनावों को चुनौतीपूर्ण बनाती है। झारखंड की राजनीति का यह वर्तमान परिदृश्य स्पष्ट करता है कि जहाँ सत्ताधारी गठबंधन के पास संख्या बल का लाभ है, वहीं विपक्षी गठबंधन इस गणित को बदलने के लिए रणनीतिक तालमेल बिठाने का प्रयास करता है। आगामी चुनावों में यह स्पष्ट हो जाएगा कि विधानसभा का यह अंकगणित राज्यसभा की सीटों में कैसे परिवर्तित होता है।