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राम रहीम और आसाराम बापू के मामलों में अंतर क्यों

भारतीय कानूनी और प्रशासनिक व्यवस्था में जब भी हाई-प्रोफाइल मामलों या देश के बड़े धर्मगुरुओं से जुड़े विवादों की बात आती है, तो जनता और विश्लेषकों की नजरें व्यवस्था की निष्पक्षता पर टिक जाती हैं। वर्तमान में देश के दो बड़े और बेहद चर्चित डेरा प्रमुख—गुरमीत राम रहीम सिंह और आसाराम बापू (आशुमल थाउमल हरपलानी)—गंभीर आपराधिक मामलों में अदालतों द्वारा दोषी ठहराए जाने के बाद जेल की सजा काट रहे हैं। हालांकि, दोनों के साथ हो रहे प्रशासनिक व्यवहार, पैरोल की बार-बार मिलने वाली मंजूरी और उनकी संपत्तियों पर हो रही कार्रवाइयों में एक बड़ा अंतर दिखाई देता है।

इस लेख में हम इन कानूनी प्रक्रियाओं और प्रशासनिक कार्रवाइयों के अंतर को तार्किक और कानूनी दृष्टिकोण से स्पष्ट करेंगे। डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को साध्वियों के यौन उत्पीड़न और पत्रकार रामचंद्र छत्रपति हत्याकांड जैसे अत्यंत गंभीर मामलों में दोषी ठहराया गया है और वह रोहतक की सुनारिया जेल में उम्रकैद की सजा काट रहा है। इसके बावजूद, पिछले कुछ वर्षों में राम रहीम को कई बार पैरोल और फर्लो की सुविधा मिली है, जो अक्सर जनमानस और मीडिया में चर्चा और विवाद का विषय बनती है।

इसके पीछे मुख्य रूप से जेल नियमावली और राज्य सरकार के प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र की भूमिका होती है। हरियाणा जेल नियमावली के नियम: पैरोल या फर्लो कोई स्थायी अधिकार नहीं बल्कि एक प्रशासनिक विशेषाधिकार है। हरियाणा के जेल नियमों के तहत यदि किसी कैदी का जेल के भीतर आचरण अच्छा रहता है और उसने अपनी सजा का एक निश्चित हिस्सा बिना किसी अनुशासनहीनता के पूरा कर लिया है, तो वह अस्थायी रिहाई के लिए आवेदन कर सकता है।

राम रहीम की पैरोल को लेकर अक्सर यह आरोप लगते हैं कि पंजाब और हरियाणा के चुनावों के समय डेरे के बड़े वोट बैंक को प्रभावित करने के लिए उसे रियायतें दी जाती हैं। हालांकि, आधिकारिक तौर पर प्रशासन इसे कानून के दायरे में दी गई सामान्य प्रक्रिया बताता है। दूसरी ओर, आसाराम बापू को जोधपुर की अदालत ने एक नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इसके अलावा, गुजरात के अहमदाबाद (साबरमती) में भी उन पर यौन उत्पीड़न का एक अन्य मामला चल रहा है।

राम रहीम की तुलना में आसाराम बापू को स्वास्थ्य आधारों के अलावा शायद ही कभी पैरोल या कोई बड़ी राहत मिली है। इसके साथ ही, हाल के दिनों में गुजरात में उनके आश्रमों और जमीनों पर सरकारी कब्जे या अतिक्रमण विरोधी कार्रवाइयों की खबरें भी सामने आई हैं। आसाराम बापू के खिलाफ मामला पॉक्सो अधिनियम के तहत दर्ज है। कानूनन, नाबालिगों के खिलाफ होने वाले गंभीर अपराधों में अदालतों और जेल प्रशासन का रुख पैरोल देने के मामले में बेहद कड़ा होता है। इसके अलावा, उनके खिलाफ दो अलग-अलग राज्यों (राजस्थान और गुजरात) में गंभीर मामले लंबित या निर्णित रहे हैं, जिससे कानूनी जटिलता बढ़ जाती है।

जमीन और अतिक्रमण पर कार्रवाई का आधार: गुजरात और देश के अन्य हिस्सों में आसाराम बापू के कई आश्रम सरकारी जमीनों, वन भूमि या नदी के कछारों पर कथित रूप से अवैध कब्जे कर बनाए गए थे। किसी भी राज्य की स्थानीय सरकार या नगर निगम को यह अधिकार होता है कि वह अवैध निर्माण या लीज की शर्तों का उल्लंघन होने पर जमीन को वापस सरकारी कब्जे में ले ले।

आसाराम के मामले में प्रशासनिक तंत्र उनके दोषी सिद्ध होने के बाद कानूनी रूप से अवैध संपत्तियों को मुक्त कराने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ा है। कानून की नजर में सभी नागरिक समान हैं, चाहे उनका सामाजिक या धार्मिक कद कितना ही बड़ा क्यों न हो। राम रहीम को मिलने वाली पैरोल जहां संबंधित राज्य की जेल नियमावली और प्रशासनिक निर्णयों के लचीलेपन को दर्शाती है, वहीं आसाराम बापू के मामले में पॉक्सो एक्ट की गंभीरता और अवैध निर्माणों पर राज्य सरकार की कड़ी नीति साफ दिखाई देती है।

यह अंतर यह स्पष्ट करता है कि सजा काट रहे अपराधियों के साथ होने वाला व्यवहार केवल उनके अपराध पर ही नहीं, बल्कि संबंधित राज्यों के स्थानीय कानूनों, अपराध की तकनीकी प्रकृति और उनकी संपत्तियों की कानूनी स्थिति पर भी निर्भर करता है। लेकिन इसके बीच यह सवाल अनुत्तरित रह जाता है कि दोनों ही राज्य भाजपा शासित राज्य हैं और आसाराम बापू के समर्थकों की संख्या भी कोई कम नहीं है। ऐसे में बार बार दो राज्य सरकारों के दृष्टिकोण में यह अंतर यह संदेह पैदा करता है कि कहीं न कहीं आसाराम बापू ने किसी और को भी नाराज कर रखा है, जिसकी वजह से उन्हें वह छूट नहीं मिल रही है जो राम रहिम को बार बार मिल रही है।