फिर से युवा ही कॉक्रोच के पीछे खड़े हो रहे
जनता के बीच घृणा के पात्र के रूप में कॉक्रोच का एक अनूठा स्थान है। विभिन्न संस्कृतियों में, यह संदूषण, क्षय और संक्रमण का प्रतीक है। जब भारत के मुख्य न्यायाधीश ने सक्रियता और सोशल मीडिया की ओर बढ़ते जा रहे बेरोजगार युवाओं के कुछ वर्गों की आलोचना करते हुए कॉक्रोच के रूपक का सहारा लिया, तो संभवतः इस टिप्पणी पर इस कीट के प्रति समाज में गहराई से बैठी सांस्कृतिक अवमानना की छाप थी।
लेकिन भारत की जेन जी नई पीढ़ी) ने इस आलोचना का जवाब एक अप्रत्याशित उलटफेर के साथ दिया। इस निंदा को खारिज करने के बजाय, उन्होंने इसे अपना लिया। इस प्रकार कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) — जो कि एक व्यंग्यात्मक राजनीतिक संगठन है — का उदय हाल के दिनों में प्रतीकात्मक विनियोग (सिम्बोलिक एप्रोप्रिएशन) के सबसे विचारोत्तेजक कृत्यों में से एक का प्रतिनिधित्व करता है।
आर्थिक असुरक्षा और राजनीतिक अलगाव का सामना कर रही एक पूरी पीढ़ी द्वारा, ऐतिहासिक रूप से तिरस्कृत माने जाने वाले इस जीव को लचीलेपन और जीवंतता के प्रतीक में बदल दिया गया है। सीजेपी की तत्काल लोकप्रियता का श्रेय पारंपरिक राजनीतिक दलों की उस विफलता को देना स्वाभाविक है, जिसके कारण वे युवा भारत के सामने मौजूद गुस्से और चिंताओं को दूर करने, समझने या हल करने में नाकाम रहे हैं।
अपनी स्थापना के महज चार दिनों के भीतर, इस संगठन ने सोशल मीडिया पर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों की लोकप्रियता को पीछे छोड़ दिया। भारत की आबादी दुनिया में सबसे युवा आबादी में से एक है, फिर भी शिक्षित युवाओं का एक बड़ा हिस्सा खुद को घिरा हुआ महसूस करता है।
डिग्रियां अब रोजगार की गारंटी नहीं देतीं; प्रतियोगी परीक्षाएं तेजी से धांधली और भ्रष्ट व्यवस्था का शिकार हो रही हैं; जीवन यापन की बढ़ती लागत, अनिश्चित रोजगार और सामाजिक सुरक्षा, गहराता पर्यावरणीय संकट, वैश्विक संघर्ष और तकनीक का खोखला आकर्षण स्पष्ट रूप से न केवल मानसिक और भावनात्मक रूप से थका रहा है, बल्कि इस पनपते संकट के खिलाफ नए आविष्कारशील जवाबों को भी जन्म दे रहा है।
सीजेपी के प्रति राजनीतिक प्रतिक्रिया भी काफी कुछ बयां करती है। भारत के सत्ताधारी शासन ने सीजेपी पर प्रतिक्रिया देते हुए शायद खुद के पाले में ही आत्मघाती गोल (ओन गोल) दाग दिया है: राष्ट्रीय सुरक्षा की आड़ में इसके सोशल मीडिया खातों को ब्लॉक करके, सरकार ने एक व्यंग्यात्मक अभियान को बड़े आंदोलन में बदलने के लिए ईंधन दे दिया है।
इसके दमन ने केवल इस धारणा को और मजबूत किया है कि निराशा व्यक्त करने वाले युवाओं को नागरिकों के बजाय एक खतरे के रूप में देखा जाता है। दूसरी तरफ, विपक्षी नेता शहरी युवाओं के बीच इस आंदोलन के भावनात्मक जुड़ाव को भांपते हुए, खुद को इससे जोड़ने के लिए दौड़ पड़े हैं। लेकिन अवसरवादी समर्थन उन वास्तविक मुद्दों के साथ दीर्घकालिक जुड़ाव का विकल्प नहीं हो सकता है, जिन्हें ये सचेत कॉकरोच (एक तरह से कहें तो) उठाने की कोशिश कर रहे हैं।
एक राजनीतिक इकाई के रूप में सीजेपी का भविष्य अभी अनिश्चित है। सोशल मीडिया से प्रेरित समूह अक्सर तब बिखर जाते हैं जब जनता का ध्यान, जो आज के समय में बेहद चंचल है, किसी दूसरे आकर्षण की ओर बढ़ जाता है। लेकिन जब युवाओं की आवाज़ और चिंताओं को इकट्ठा करने और उन्हें बुलंद करने की बात आती है, तो सीजेपी एक और प्रभावी उपकरण के रूप में उभर सकती है।
दुनिया भर में, युवा पीढ़ियां तेजी से डिजिटल प्लेटफॉर्म के अभिनव उपयोग के माध्यम से राजनीति को नया आकार दे रही हैं, जो पारंपरिक पार्टी संरचनाओं से बाहर काम करते हैं: उदाहरण के लिए, नेपाल को हिलाकर रख देने वाला जेन जी का विरोध प्रदर्शन डिस्कॉर्ड नाम के एक सोशल मीडिया ऐप पर फैला और लंबे समय तक बना रहा।
संस्थाओं पर अविश्वास करने वाले लेकिन सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह पीछे हटने के अनिच्छुक लोगों के लिए अब व्यंग्य, हास्य, मीम्स और प्रतीकात्मक उलटफेर राजनीतिक भाषा के रूप में कार्य कर रहे हैं। सीजेपी इसी बदलाव के क्षण को दर्शाती है। यह बात राहत देने वाली है कि इसके योजनाकारों ने किसी लोकतांत्रिक विरोधी विच्छेद (रप्चर) के बजाय संवैधानिक असहमति में अपना विश्वास जताया है।
इससे पहले हर असहमति को सत्ता की ताकत से दबाने की चाल ने इस सरकार को दमन का अभ्यस्त बना दिया है। शायद इसी वजह से वह इस नई पहल को स्वीकार नहीं कर पा रही है। लेकिन सीजेपी के इस उल्कापिंड जैसे तीव्र उभार से जो बुनियादी सवाल उठता है, वह यह है: पारंपरिक राजनीतिज्ञ अब वह क्यों नहीं सुन पा रहे हैं जो एक कॉक्रोच या उनकी जमात आखिरकार कहना चाहता है?