एंटोनियो गुटेरस के उत्तराधिकारी की दौड़ अब तेज हुई
एजेंसियां
संयुक्त राष्ट्रः इक्वाडोर की पूर्व विदेश मंत्री मारिया फर्नांडा एस्पिनोसा संयुक्त राष्ट्र के अगले महासचिव पद की दौड़ में शामिल होने वाली पांचवीं आधिकारिक उम्मीदवार बन गई हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रवक्ता ने मंगलवार को जानकारी दी कि एंटीगुआ और बारबुडा ने आधिकारिक तौर पर उनके नाम का प्रस्ताव रखा है। एस्पिनोसा मौजूदा महासचिव एंटोनियो गुटेरेस का स्थान लेने की कोशिश कर रही हैं, जिनका कार्यकाल इस वर्ष के अंत में समाप्त हो रहा है।
मारिया फर्नांडा एस्पिनोसा का राजनयिक करियर बेहद प्रभावशाली रहा है। यूएनजीए की पूर्व अध्यक्ष के तौरपर उन्होंने सितंबर 2018 से सितंबर 2019 तक संयुक्त राष्ट्र महासभा के 73वें सत्र की अध्यक्षता की थी। वह इस पद को संभालने वाली लैटिन अमेरिका की पहली महिला थीं। उन्होंने इक्वाडोर की विदेश मंत्री (दो बार) और रक्षा मंत्री के रूप में भी सेवा दी है। वे अपने देश में रक्षा मंत्री बनने वाली पहली महिला थीं। अपने विज़न स्टेटमेंट में उन्होंने शांति और सुरक्षा, डिजिटल परिवर्तन और संयुक्त राष्ट्र को अधिक प्रभावी बनाने के पांच स्तंभों पर आधारित एजेंडा पेश किया है।
एस्पिनोसा के अलावा, चार अन्य प्रमुख उम्मीदवार पहले से ही इस दौड़ में शामिल हैं। मिशेल बाचेलेट चिली की पूर्व राष्ट्रपति और मानवाधिकारों के लिए पूर्व यूएन हाई कमिश्नर। राफेल ग्रॉसी (अर्जेंटीना): अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के वर्तमान महानिदेशक। रेबेका ग्रिनस्पैन (कोस्टा रिका): यूएनसीटीएडी की वर्तमान महासचिव। मैकी सॉल (सेनेगल): सेनेगल के पूर्व राष्ट्रपति।
भौगोलिक रोटेशन की परंपरा के अनुसार, इस बार संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व की बारी लैटिन अमेरिका की है। साथ ही, कई सदस्य देश इस बात पर जोर दे रहे हैं कि पहली बार किसी महिला को इस सर्वोच्च पद पर नियुक्त किया जाना चाहिए। सुरक्षा परिषद की सिफारिश: जुलाई के अंत तक सुरक्षा परिषद चयन प्रक्रिया शुरू करेगी। परिषद के पांच स्थायी सदस्यों (अमेरिका, चीन, रूस, ब्रिटेन और फ्रांस) में से किसी का भी वीटो उम्मीदवार के मार्ग में बाधा बन सकता है। सुरक्षा परिषद की सिफारिश के बाद, 193 सदस्यीय महासभा पांच साल के कार्यकाल के लिए महासचिव का चुनाव करती है। जो भी नया महासचिव चुना जाएगा, वह 1 जनवरी, 2027 को अपना पदभार ग्रहण करेगा। एस्पिनोसा की उम्मीदवारी ने इस दौड़ को और अधिक प्रतिस्पर्धी बना दिया है, विशेष रूप से लैटिन अमेरिकी देशों और महिला नेतृत्व की मांग के बीच।