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हिजबुल्लाह और राष्ट्रपति के बीच तनाव

हथियार सौंपने के मुद्दे पर अब भी मतभेद कायम

एजेंसियां

बेरूतः लेबनान में राष्ट्रपति जोसेफ औन और हिजबुल्लाह के बीच इजरायल के साथ सीधे शांति वार्ता को लेकर मतभेद गहरा गए हैं, जिससे देश एक बार फिर राजनीतिक गतिरोध की स्थिति में है। जहां राष्ट्रपति औन युद्ध समाप्त करने के लिए सीधी बातचीत के पक्ष में हैं, वहीं ईरान समर्थित हिजबुल्लाह इसे आत्मसमर्पण मानकर खारिज कर रहा है।

राष्ट्रपति औन का मानना है कि लेबनान के पास अब बातचीत के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। उनका उद्देश्य इजरायल के साथ सीधी बातचीत के जरिए युद्ध रोकना, दक्षिणी लेबनान से इजरायली सेना की वापसी सुनिश्चित करना और सीमा विवाद को सुलझाना है। उन्होंने हिजबुल्लाह पर तीखा हमला करते हुए कहा कि जो लोग लेबनान को संघर्ष में खींच लाए, वे वास्तव में देशद्रोह कर रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी औन और इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू के बीच एक ऐतिहासिक बैठक की मेजबानी करने की इच्छा जताई है।

हिजबुल्लाह प्रमुख नईम कासिम ने चेतावनी दी है कि ये वार्ताएं देश में अस्थिरता पैदा करेंगी। संगठन ने स्पष्ट किया है कि वे न तो इन वार्ताओं को मान्यता देंगे और न ही अपने हथियार डालेंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि हिजबुल्लाह अब राजनीतिक रूप से अलग-थलग पड़ रहा है और उसका समर्थन आधार मुख्य रूप से केवल शिया समुदाय तक सीमित रह गया है। पूर्व हिजबुल्लाह सांसद नवाफ मौसावी ने राष्ट्रपति औन को मिस्र के पूर्व राष्ट्रपति अनवर सादात के हश्र की याद दिलाते हुए उन्हें आगाह किया है।

विश्लेषकों का मानना है कि लेबनान दो विपरीत विचारधाराओं के बीच फंस गया है। एक तरफ कमजोर पड़ चुका लेकिन अब भी सैन्य रूप से सक्षम हिजबुल्लाह है, और दूसरी तरफ एक ऐसा प्रशासन है जो शांति वार्ता के जरिए आगे बढ़ना चाहता है। देश की सड़कों पर भी यह विभाजन साफ दिख रहा है, जहाँ पूर्वी बर्माको में औन के समर्थन में होर्डिंग्स लगे हैं, वहीं हवाई अड्डे की ओर जाने वाली सड़कों पर उन्हें गद्दार बताने वाले नारे लिखे गए हैं। इस तनाव के बीच इजरायल ने भी चेतावनी दी है कि यदि हिजबुल्लाह ने हमले जारी रखे, तो वह अपनी सैन्य कार्रवाई फिर से शुरू कर सकता है।