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जांच आयोग की रिपोर्ट और गहराता विवाद

पिछले साल की चुनावी हिंसा में मारे गये थे अनेक लोग

एजेंसियां

नैरोबीः तंजानिया में पिछले साल अक्टूबर में हुए आम चुनावों के दौरान भड़की हिंसा को लेकर एक सरकारी जांच आयोग ने अपनी बहुप्रतीक्षित रिपोर्ट पेश कर दी है। जारी रिपोर्ट के अनुसार, आधिकारिक तौर पर पहली बार यह स्वीकार किया गया है कि इस चुनावी उथल-पुथल में कम से कम 518 लोगों की जान गई थी

हालांकि, इस आयोग की रिपोर्ट ने देश के राजनीतिक हलकों में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। जहाँ एक तरफ सरकार ने मौतों का आधिकारिक आंकड़ा पेश किया, वहीं दूसरी ओर हिंसा की पूरी जिम्मेदारी प्रदर्शनकारियों पर मढ़ दी गई है। इस रुख से विपक्षी दल बेहद आक्रोशित हैं और उन्होंने आयोग पर पक्षपातपूर्ण होने का गंभीर आरोप लगाया है।

उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने भी अनुमान लगाया था कि प्रमुख विपक्षी उम्मीदवारों को राष्ट्रपति और संसदीय चुनावों से बाहर रखे जाने के कारण हुई हिंसा में सैकड़ों लोग मारे गए थे। मुख्य विपक्षी दल ने तो यहाँ तक दावा किया था कि मृतकों की संख्या हजारों में हो सकती है।

अब तक तंजानियाई अधिकारी हताहतों की संख्या पर टिप्पणी करने से बचते रहे थे, उनका कहना था कि वे राष्ट्रपति सामिया सुलुहू हसन द्वारा नवंबर में नियुक्त किए गए आयोग की रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं। सुरक्षा बलों द्वारा अत्यधिक बल प्रयोग के मानवाधिकार समूहों के आरोपों को भी सरकार लगातार खारिज करती आई है।

आयोग के अध्यक्ष मोहम्मद चांडे उस्मान ने राष्ट्रपति हसन को रिपोर्ट सौंपते समय स्वीकार किया कि मृतकों का यह आंकड़ा (518) वास्तविक संख्या से कम हो सकता है, क्योंकि कई पीड़ितों की पहचान करना बेहद चुनौतीपूर्ण था। चौंकाने वाली बात यह है कि चांडे ने कानून प्रवर्तन एजेंसियों की भूमिका पर कोई टिप्पणी या निर्णय देने के बजाय, विशिष्ट घटनाओं की जांच के लिए एक अलग आपराधिक जांच आयोग गठित करने की सिफारिश की है।

चांडे ने दावा किया कि आयोग के पास पुख्ता सबूत हैं कि यह हिंसा प्रशिक्षित लोगों द्वारा सुनियोजित और वित्त पोषित थी, हालांकि उन्होंने किसी विशिष्ट समूह या व्यक्ति का नाम नहीं लिया। उनके अनुसार, आयोजकों ने भोले-भाले लोगों और हताश युवाओं का इस्तेमाल कर देश के विभिन्न हिस्सों में एक साथ हिंसा फैलाने की तकनीक अपनाई थी।

राष्ट्रपति सामिया सुलुहू हसन, जिन्हें 98 प्रतिशत मतों के साथ विजेता घोषित किया गया था, ने इन विरोध प्रदर्शनों को अपनी सरकार गिराने की एक विदेशी साजिश करार दिया है। हालांकि, इस दावे के समर्थन में अब तक कोई ठोस सबूत पेश नहीं किए गए हैं। दिलचस्प बात यह है कि इस रिपोर्ट को तत्काल सार्वजनिक नहीं किया गया है और राष्ट्रपति ने इसे राष्ट्रपति की संपत्ति बताते हुए इसके सार्वजनिक होने पर अनिश्चितता बनाए रखी है।

मुख्य विपक्षी दल चाडेमा ने इस पूरी जांच को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि जिस सरकार पर खुद हिंसा और दुर्व्यवहार के आरोप हों, वह निष्पक्ष रूप से अपनी जांच नहीं कर सकती। रॉयटर्स जैसी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की रिपोर्टिंग में भी ऐसे गवाहों के बयान सामने आए थे जहाँ पुलिस ने निहत्थे लोगों पर गोलियां चलाई थीं, जो इस सरकारी रिपोर्ट के दावों पर गंभीर सवालिया निशान लगाते हैं।