विदेशी सैनिकों के जत्थे की मौजूदगी में नया राज खुला
पोर्ट ओ प्रिंसः कैरेबियन देश हैती इस समय अपने इतिहास के सबसे काले दौर से गुजर रहा है। देश में गहराते सुरक्षा संकट और राजनीतिक अस्थिरता के बीच एक अत्यंत विचलित करने वाला तथ्य सामने आया है, जिसने अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंताएं बढ़ा दी हैं। रिपोर्टों के अनुसार, हैती में सक्रिय खूंखार आपराधिक गिरोहों की कुल संख्या का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा बच्चे हैं। ये बच्चे, जिन्हें सुरक्षा बलों का सामना करना चाहिए था, अब स्वयं एक नई विदेशी बहुराष्ट्रीय सुरक्षा सेना के साथ सीधे संघर्ष की कगार पर खड़े हैं।
हैती की राजधानी, पोर्ट-ऑ-प्रिंस, वर्तमान में लगभग पूरी तरह से हिंसक गिरोहों के नियंत्रण में है। यूनिसेफ और अन्य अंतरराष्ट्रीय निकायों की हालिया रिपोर्टों के अनुसार, हजारों बच्चों को जबरन इन सशस्त्र समूहों में भर्ती किया गया है। हैती में व्याप्त चरम गरीबी, भुखमरी और शिक्षा व्यवस्था के पूरी तरह ध्वस्त हो जाने के कारण ये मासूम बच्चे गिरोहों के लिए आसान शिकार बन जाते हैं। गिरोह के सरगना इन बच्चों का इस्तेमाल केवल लड़ाकों या सैनिकों के रूप में ही नहीं, बल्कि सूचनाएं जुटाने वाले जासूसों, संदेशवाहकों और रसद पहुँचाने वाले सहायकों के रूप में भी कर रहे हैं। कई मामलों में, इन बच्चों को ढाल के रूप में अग्रिम पंक्ति में रखा जाता है।
स्थिति की गंभीरता तब और बढ़ गई जब संयुक्त राष्ट्र समर्थित एक बहुराष्ट्रीय सुरक्षा मिशन के हैती पहुँचने की प्रक्रिया शुरू हुई। इस मिशन का नेतृत्व केन्या कर रहा है, जिसमें कई अन्य देशों के सुरक्षा बल भी शामिल हैं। मानवाधिकार संगठनों ने इस पर गंभीर चेतावनी जारी की है। उनका तर्क है कि जब यह विदेशी बल गिरोहों के ठिकानों पर सैन्य कार्रवाई शुरू करेगा, तो सबसे पहले ये बच्चे ही हिंसा की चपेट में आएंगे। विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि इन बच्चों को अपराधी या लक्ष्य के बजाय पीड़ित के रूप में देखा जाना चाहिए, क्योंकि उन्होंने स्वेच्छा से नहीं बल्कि व्यवस्था की विफलता और मजबूरी के कारण हथियार उठाए हैं।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने अब एक विकट धर्मसंकट है: गिरोहों के आतंक को खत्म करना अनिवार्य है, लेकिन इसे उन हजारों मासूम जिंदगियों की कीमत पर नहीं किया जा सकता जिन्हें सुरक्षा की दरकार है। यदि इस विदेशी हस्तक्षेप के दौरान बच्चों के सुरक्षित निष्कर्षण, उनके मनोवैज्ञानिक पुनर्वास और सामाजिक सुरक्षा के लिए कोई स्पष्ट और प्रभावी प्रोटोकॉल नहीं अपनाया गया, तो हैती का संकट एक भयावह मानवीय त्रासदी में बदल सकता है। हैती का भविष्य इन्हीं बच्चों पर निर्भर है, और यदि वे इस सैन्य अभियान में कोलेटरल डैमेज बनते हैं, तो देश को इस घाव से उबरने में दशकों लग सकते हैं।