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सरकारी दावों के बावजूद ऊर्जा संकट का असर उदयोग जगत पर

भारतीय विनिर्माण क्षेत्र की रफ्तार पड़ी धीमी

राष्ट्रीय खबर

बेंगलुरुः भारत के विनिर्माण क्षेत्र की विकास दर मार्च 2026 में पिछले करीब चार वर्षों के सबसे निचले स्तर पर दर्ज की गई है। एक निजी सर्वेक्षण के अनुसार, मध्य पूर्व में जारी तनाव और अनिश्चितता के कारण आपूर्ति श्रृंखला में आए व्यवधान और बढ़ती तेल कीमतों ने औद्योगिक गतिविधियों को प्रभावित किया है। एचएसबीसी इंडिया मैन्युफैक्चरिंग परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स के आंकड़ों से स्पष्ट है कि वैश्विक परिस्थितियों का असर अब भारतीय कारखानों की उत्पादकता पर दिखने लगा है।

एसएंडपी ग्लोबल द्वारा संकलित एचएसबीसी इंडिया मैन्युफैक्चरिंग पीएमआई फरवरी के 56.9 से गिरकर मार्च में 53.9 पर आ गया है। हालांकि, 50 से ऊपर का सूचकांक अभी भी विस्तार को दर्शाता है, लेकिन यह गिरावट मार्च 2022 के बाद की सबसे धीमी वृद्धि दर को रेखांकित करती है।

मांग के प्रमुख पैमाने नए ऑर्डर और कुल उत्पादन में भी पिछले चार वर्षों की तुलना में सबसे कमजोर विस्तार देखा गया है। एचएसबीसी की मुख्य भारतीय अर्थशास्त्री प्रांजुल भंडारी के अनुसार, मध्य पूर्व के संघर्ष ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में जो हलचल पैदा की है, उसका सीधा असर भारतीय निर्माताओं पर पड़ रहा है।

भारतीय कारखानों को अगस्त 2022 के बाद से सबसे गंभीर लागत दबाव का सामना करना पड़ रहा है। कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के साथ-साथ एल्युमीनियम, रसायनों और स्टील की कीमतों में भी भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इस इनपुट लागत में वृद्धि के बावजूद, प्रतिस्पर्धा के कारण कंपनियों ने अपनी बिक्री कीमतों में पिछले दो वर्षों की तुलना में सबसे धीमी गति से वृद्धि की है। इसका मतलब है कि कंपनियां कच्चे माल की बढ़ी हुई कीमतों का पूरा बोझ उपभोक्ताओं पर नहीं डाल पा रही हैं, जिससे उनके मुनाफे के मार्जिन पर असर पड़ सकता है।

इन चुनौतियों के बावजूद, रोजगार के मोर्चे पर सकारात्मक संकेत मिले हैं। मार्च में रोजगार वृद्धि सात महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई क्योंकि कंपनियों ने बकाया कार्यों को निपटाने और भविष्य की विस्तार योजनाओं के लिए नए कर्मचारियों की भर्ती जारी रखी। इसके अलावा, विनिर्माता आगामी वर्ष के लिए काफी आशान्वित हैं। कृषि क्षेत्र में मजबूती की उम्मीद और क्षमता विस्तार के भरोसे कारोबारी धारणा मई 2024 के बाद के उच्चतम स्तर पर है। निर्यात ऑर्डर्स में भी मार्च में छह महीने का उच्चतम उछाल देखा गया, जो वैश्विक बाजार में भारतीय उत्पादों की मांग को दर्शाता है।