दुनिया भर की खाद्य आपूर्ति श्रृंखला पर भी आग का असर
दोहाः ईरान युद्ध से न केवल तेल, बल्कि वैश्विक खाद्य आपूर्ति पर भी मंडराया खतरादुनिया का ध्यान फिलहाल मध्य पूर्व में जारी युद्ध और उसके कारण तेल एवं गैस की बढ़ती कीमतों पर केंद्रित है, लेकिन इस संघर्ष का एक और भयानक पहलू सामने आ रहा है—एक गहराता वैश्विक खाद्य संकट।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से ऊर्जा बाजार में तो हड़कंप मचा ही है, लेकिन अब विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि यह युद्ध लंबा खिंचता है, तो दुनिया को अनाज की भारी किल्लत का सामना करना पड़ सकता है।इस संकट की सबसे बड़ी वजह उर्वरक उत्पादन में आई गिरावट है। हाल ही में कतर की सरकारी उर्वरक कंपनी का विशाल यूरिया प्लांट परिचालन से बाहर हो गया है।
यह दुनिया का सबसे बड़ा एकल यूरिया उत्पादन केंद्र है, जो वैश्विक आपूर्ति का लगभग 14 फीसद हिस्सा पैदा करता है। 4 मार्च से इस प्लांट में उत्पादन ठप है, क्योंकि ईरान द्वारा कतर के एलएनजी केंद्रों पर किए गए हमलों के कारण गैस की आपूर्ति बाधित हो गई है। यूरिया बनाने के लिए प्राकृतिक गैस एक अनिवार्य कच्चा माल है।हैरानी की बात यह है कि इस संकट की मार सबसे ज्यादा उन्हीं खाड़ी देशों पर पड़ सकती है जो इसका केंद्र हैं।
ये देश अपनी अर्थव्यवस्था चलाने के लिए तेल निर्यात पर निर्भर हैं, लेकिन अपनी खाद्य जरूरतों के लिए पूरी तरह बाहरी दुनिया से होने वाले आयात पर टिके हैं। ईरान युद्ध के कारण जहाँ एक ओर तेल बाहर नहीं जा पा रहा है, वहीं दूसरी ओर इन देशों में भोजन और कृषि उत्पादों का आना भी बंद हो गया है।युद्ध के तीसरे हफ्ते में प्रवेश करने के साथ ही इसके प्रभाव दक्षिण एशिया (भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश) और अफ्रीका तक पहुँच चुके हैं।
भारत अपनी यूरिया जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा कतर से आयात करता है। दक्षिण-पूर्व एशिया में यूरिया की कीमतें पहले ही 40 प्रतिशत तक बढ़ चुकी हैं।इस बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा हमलों पर लगाया गया पांच दिवसीय अस्थायी युद्धविराम चर्चा का विषय बना हुआ था। माना जा रहा है कि इसका एक बड़ा कारण अमेरिका के पास युद्धक हथियारों और गोला-बारूद की कमी होना है।
विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका लंबे समय तक चलने वाले युद्ध के लिए अपनी युद्ध सामग्री का भंडार खाली नहीं करना चाहता, क्योंकि उसे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी सुरक्षा चुनौतियों को भी ध्यान में रखना है। यह ‘युद्धविराम’ शायद एक कूटनीतिक चाल है ताकि अमेरिका अपनी सैन्य और आर्थिक स्थिति का पुनर्मूल्यांकन कर सके, जबकि दुनिया एक संभावित अकाल की दहलीज पर खड़ी है।