भारतीय रुपये में रिकार्ड गिरावट दर्ज की गयी
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93 रुपया का नया रिकार्ड बन गया है
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गिरावट से देशी निवेशकों की चिंता बढ़ी
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पूंजी की बाहरी निकासी की गति अधिक
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः भारतीय मुद्रा बाजार में बुधवार को उस समय हड़कंप मच गया जब अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया गिरकर 93.00 के अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। दोपहर के कारोबारी सत्र के दौरान रुपये में आई इस भारी गिरावट ने निवेशकों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि रुपये के इस खराब प्रदर्शन के पीछे मुख्य रूप से कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और भारतीय शेयर बाजार से विदेशी निवेशकों द्वारा लगातार की जा रही पूंजी की निकासी जिम्मेदार है।
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए कच्चे तेल के आयात पर बहुत अधिक निर्भर है। मध्य पूर्व में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच छिड़े युद्ध के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति श्रृंखला बाधित हुई है। विशेष रूप से हॉर्मुज जलडमरूमध्य, जहां से दुनिया के कुल तेल का पांचवां हिस्सा गुजरता है, उसके बंद होने से कीमतों में भारी उछाल आया है। हालांकि ईरान ने भारतीय ध्वज वाले टैंकरों और एलपीजी जहाजों को रास्ता देने की अनुमति दी है, जिससे घरेलू आपूर्ति की चिंता तो कम हुई है, लेकिन तेल की ऊंची कीमतों के कारण भारत का राजकोषीय घाटा बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है।
नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के आंकड़ों के अनुसार, मार्च के महीने में विदेशी संस्थागत निवेशक हर कारोबारी दिन शुद्ध विक्रेता रहे हैं और उन्होंने अब तक लगभग 70,989.96 करोड़ रुपये की हिस्सेदारी बेची है। तेल की बढ़ती कीमतों ने बाजार विशेषज्ञों को वित्त वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही के लिए कमाई के अनुमानों में कटौती करने पर मजबूर कर दिया है, जिससे विदेशी निवेशक भारतीय बाजारों से पैसा निकाल रहे हैं।
इस बीच, वैश्विक निवेशकों की नजरें अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति घोषणा पर टिकी हैं। अनुमान है कि फेड ब्याज दरों को 3.50 प्रतिशत से 3.75 प्रतिशत की सीमा में स्थिर रखेगा। दुनिया भर में बढ़ती महंगाई की आशंकाओं के बीच निवेशक फेड चेयरमैन जेरोम पॉवेल के बयानों और डॉट प्लॉट का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं ताकि भविष्य की ब्याज दरों की दिशा का संकेत मिल सके। वर्तमान डेटा के अनुसार, जुलाई तक दरों में बदलाव की संभावना कम है, जबकि सितंबर में कटौती की 53 प्रतिशत संभावना जताई जा रही है।