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नजर के सामने जिगर के पार .. .. .. ..  ..

संसद के भीतर इन दिनों जो नज़र का खेल चल रहा है, वह किसी सत्तर के दशक की मसाला फिल्म के क्लाइमेक्स से कम नहीं है। दृश्य बड़ा ही रोचक है—एक तरफ से तीखी नज़रों वाली चुनौतियां उछाली जा रही हैं और दूसरी तरफ सत्ता पक्ष के दिग्गज बार-बार गला तर कर रहे हैं। ऐसा लग रहा है मानो शब्दों की गर्मी इतनी बढ़ गई है कि वॉटर कूलर की पाइपलाइन सीधे माननीय मंत्रियों की मेजों तक बिछानी पड़ेगी।

राहुल गांधी जब सदन में ऊर्जा संकट और अंतरराष्ट्रीय रसूखदारों के याराना का कच्चा चिट्ठा खोल रहे थे, तब माननीयों का बार-बार पानी पीना महज प्यास नहीं, बल्कि उस बेचैनी का प्रतीक था जो अक्सर कड़वे सच को सुनने से पैदा होती है। अविश्वास प्रस्ताव की अग्निपरीक्षा से तपकर निकले ओम बिड़ला जी ने आसन पर बैठते ही फिर से वही पुराना राग छेड़ा— अनुशासन और मर्यादा। लेकिन तब तक तीर कमान से निकल चुका था। सरकार की डिजिटल दीवारें और कैमरों की पैनिंग तकनीक भी उस सच को नहीं ढंक पाई जिसे जनता अपनी नंगी आंखों से देख चुकी थी।

आजकल सदन की कार्यवाही किसी रियलिटी शो जैसी हो गई है। जैसे ही विपक्ष का स्वर सप्तम सुर पर पहुँचता है, अचानक तकनीकी खराबी के चलते माइक मौन हो जाता है और कैमरा किसी ऐसी दीवार या फूलदान पर फोकस हो जाता है, जिसका राजनीति से दूर-दूर तक नाता नहीं। लेकिन सरकार शायद यह भूल रही है कि मैंगो मैन यानी आम आदमी अब इस एडिटिंग का उस्ताद हो चुका है। उसे पता है कि जब स्क्रीन पर शून्य छाता है, तो समझो कहीं न कहीं शोर तगड़ा मचा है।

एक तरफ सदन की चिकनी मेजों पर आंकड़े रखे जाते हैं कि रसोई गैस का कोई संकट नहीं है। सोशल मीडिया के डिजिटल सिपाही तो यहाँ तक दावा कर देते हैं कि उन्होंने पलक झपकाई और सिलेंडर घर के आंगन में प्रकट हो गया। लेकिन हकीकत की ज़मीन पर नज़र डालें, तो हर शहर के गैस वितरक केंद्रों पर लगी लंबी कतारें सरकार के दावों का मज़ाक उड़ा रही हैं। जनता अब सरकारी दलीलों के चश्मे से नहीं, बल्कि अपनी खाली जेब और चूल्हे के धुएं से सच को पहचान रही है।

अंत में बात करें सदन के रक्षक यानी स्पीकर महोदय की। उनकी स्थिति उस अंपायर जैसी हो गई है जिसे एक ही टीम को जिताने का जिम्मा सौंपा गया हो, लेकिन खिलाड़ी इतने अनाड़ी निकलें कि अंपायर की तटस्थता का मुखौटा ही उतर जाए। विपक्ष की नज़रों में अब आसन की वह गरिमा महज़ एक असाइनमेंट बनकर रह गई है। जब नज़र के सामने सच सीना तानकर खड़ा हो, तो उसे कागजों से ढंकने की कोशिशें अक्सर हंसी का पात्र ही बनती हैं।

इसी बात पर अपने जमाने की एक सुपरहिट फिल्म आशिकी का यह गीत याद आने लगा है। इस गीत को लिखा था समीर ने और संगीत में ढाला था नदीम श्रवण की जोड़ी ने। इसे कुमार सानू और अनुराधा पौडवाल ने अपना स्वर दिया था। गीत के बोल इस तरह हैं।

नज़र के सामने, जिगर के पार कोई रहता है,  वो हो तुम

नज़र के सामने, जिगर के पार कोई रहता है, वो हो तुम

नज़र के सामने, जिगर के पार कोई रहता है, वो हो तुम

नज़र के सामने, जिगर के पार कोई रहता है, वो हो तुम

बेताबी क्या होती है, पूछो मेरे दिल से

तन्हा तन्हा तड़पा हूँ,  मैं तो मुश्किल से

बेताबी क्या होती है, पूछो मेरे दिल से

तन्हा तन्हा तड़पा हूँ, मैं तो मुश्किल से

जीना दुश्वार है, धड़कन बेज़ार है कोई रहता है, वो हो तुम

नज़र के सामने, जिगर के पार कोई रहता है, वो हो तुम

तन्हाई में अक्सर, तुझको याद करता हूँ

रात दीवानी हो के,  आहें भरता हूँ

तन्हाई में अक्सर, तुझको याद करता हूँ

रात दीवानी हो के, आहें भरता हूँ

हर पल यादें हैं, लम्बी रातें हैं कोई रहता है, वो हो तुम

नज़र के सामने, जिगर के पार कोई रहता है, वो हो तुम

नज़र के सामने, जिगर के पार कोई रहता है, वो हो तुम

नज़र के सामने, जिगर के पार कोई रहता है, वो हो तुम…

लिहाजा नजर लड़ाने से लेकर नजर चुराने तक का खेल रोचक हो चुका है। खाड़ी क्षेत्र में अपने अंकल सैम ने भी बड़ी बड़ी बातें की थी। अब नुकसान बढ़ने लगा तो वह भी किसी तरह नजर बचाकर बच निकलने का रास्ता तलाश रहे हैं। पहली बार अमेरिका को भी आंटे दाल का भाव पता चल रहे हैं। यूक्रेन युद्ध की चर्चा अभी हाशिये पर हैं और दूसरी तरफ ब्लादिमीर पुतिन नजर लड़ाते हुए लगातार मुस्कुरा रहे हैं।