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तमिलनाडु चुनाव से पहले संभलकर खेल रहा डीएमके

राष्ट्रीय खबर

चेन्नईः हफ्तों की अनिश्चितता और असमंजस के बाद, आखिरकार द्रमुक और कांग्रेस ने आगामी चुनावों के लिए सीटों के बंटवारे पर समझौता कर लिया है। डीएमके ने कांग्रेस की अधिक सीटों की मांग को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया है, लेकिन साथ ही कांग्रेस को अपनी उन मांगों को कम करने के लिए भी मजबूर किया, जिन्हें डीएमके अवास्तविक मान रही थी।

अंतिम समझौते के अनुसार, कांग्रेस को पिछले चुनाव की 25 सीटों की तुलना में इस बार 28 सीटें दी गई हैं। डीएमके के नेतृत्व वाला सेक्युलर प्रोग्रेसिव अलायंस अन्य सहयोगियों के साथ भी सीटों के बंटवारे को अंतिम रूप दे रहा है। हालांकि, कांग्रेस के साथ बातचीत सबसे अधिक कड़वाहट भरी रही। इस घर्षण का मुख्य कारण कांग्रेस के कुछ नेताओं का वह रवैया था, जिनका मानना है कि डीएमके के साथ गठबंधन से उनकी पार्टी को कोई खास जमीनी फायदा नहीं हुआ है।

कांग्रेस ने सत्ता में हिस्सेदारी और बहुत अधिक सीटों की अपनी शुरुआती मांग से पीछे हटते हुए 28 निर्वाचन क्षेत्रों पर संतोष किया है। हालांकि यह संख्या 2011 और 2016 के विधानसभा चुनावों में लड़ी गई सीटों से कम है, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व गठबंधन के भीतर बदलते राजनीतिक समीकरणों के साथ तालमेल बिठाता नजर आ रहा है। 2021 की तुलना में इस बार गठबंधन में अधिक दल शामिल हैं, इसलिए डीएमके को अन्य सहयोगियों के लिए भी जगह बनानी पड़ी है।

विजय की पार्टी और आंतरिक मतभेद डीएमके और कांग्रेस वैचारिक रूप से भाजपा के विरोध में एक साथ रहे हैं। लेकिन अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी टीवीके के उदय ने कांग्रेस के एक धड़े के भीतर हलचल पैदा कर दी थी। रिपोर्टों के अनुसार, कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने, जिन्हें केंद्रीय नेतृत्व के कुछ वर्गों का समर्थन प्राप्त था, द्रविड़ सहयोगी (डीएमके) से अलग होकर विजय की नई पार्टी के साथ हाथ मिलाने का विचार रखा था। उनका मानना था कि इससे तमिलनाडु में कांग्रेस की स्थिति मजबूत हो सकती है। हालांकि, अधिकांश विधायकों ने डीएमके के साथ ही गठबंधन जारी रखने के पक्ष में राय दी।

वरिष्ठ पत्रकार के. विजयशंकर का कहना है कि तमिलनाडु में कांग्रेस अपने दम पर कोई बड़ी ताकत नहीं है। उसका कुछ क्षेत्रों में प्रभाव जरूर है, लेकिन उसका स्वाभाविक सहयोगी डीएमके ही है। यदि कांग्रेस विजय की पार्टी के साथ जाती, तो यह एक बड़ी राजनीतिक भूल होती।

सीटों के बंटवारे में हुई देरी कांग्रेस के भीतर के आंतरिक दबाव को भी दर्शाती है। पार्टी कार्यकर्ता लगातार नेतृत्व से यह सवाल पूछ रहे हैं कि इतने लंबे समय तक डीएमके के साथ रहने से पार्टी को वास्तविक राजनीतिक लाभ क्या मिला है। एक कांग्रेस नेता ने नाम न छापने की शर्त पर 1971 के ऐतिहासिक गठबंधन का जिक्र करते हुए कहा, जो आज भाजपा उत्तर भारत में क्षेत्रीय दलों के साथ कर रही है, वही डीएमके ने पहले कांग्रेस के साथ किया था। उन्होंने उस दौर की याद दिलाई जब कांग्रेस ने तमिलनाडु विधानसभा चुनाव न लड़ने और केवल लोकसभा सीटों पर ध्यान केंद्रित करने का समझौता किया था, जिससे राज्य की राजनीति में उसका आधार धीरे-धीरे सिमटता चला गया।