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कचरा बीनने वाली महिलाओं की अद्भुत कहानी! शहर साफ करते-करते किसी ने किया BA तो कोई बनी आत्मनिर्भर

सरगुजा: अंबिकापुर की रेशमा सोनी स्वच्छता दीदी हैं. गांव में 12वीं तक की पढ़ाई की, उसके बाद शादी हो गई. लेकिन शादी के कुछ दिनों बाद ही एक एक्सीडेंट में पति गुजर गए, लेकिन इस मुश्किल घड़ी में आंसू बहाने के बजाए रेशमा ने न सिर्फ खुद को संभाला बल्कि परिवार का भी संबल बनीं. गांव में सहेली के जरिए एसएलआरएम सेंटर में काम मिला, जहां कचरे का संग्रहण किया जाता है. इस तरह कचरे के जरिए रेशमा ने अपनी जिंदगी संवारी.

रोजगार के साथ शिक्षा भी

रेशमा सोनी, स्वच्छ भारत मिशन से जुड़कर केना बांध सेंटर में पिछले 13 साल से काम कर रही हैं. अभी इंचार्ज के पद पर हैं. एसएलआरएम सेंटर में काम के साथ पढ़ाई भी फिर से शुरू की. बीए फाइनल कर चुकी है. आगे भी पढ़ना चाहती है. कंप्यूटर कोर्स करना चाहती है. रेशमा का बेटा पांचवी क्लास में पढ़ता है. जीवन का अब एक ही लक्ष्य है बच्चे की अच्छी पढ़ाई और खुद भी ऊंची शिक्षा हासिल करना.

“एसएलआरएम सेंटर में काम करने से पहले पैसे के लिए मोहताज हो गए थे. लेकिन इस काम से जुड़ने के बाद कई लोगों ने मदद की. जीवन में बहुत बदलाव आया. अब हमें हर महीने सैलरी मिलती है, जिसका इंतजार रहता है.” रेशमा सोनी SLRM सेंटर में इंचार्ज है, उसने ये बातें कही.

“जीवन आसान हुआ, प्राइवेट कॉलेज में पढ़ रही बच्ची”

रेशमा की ही तरह दूसरी महिलाएं भी आत्मनिर्भर बन परिवार का सहारा बनीं हैं. शिरोमणि केरकेट्टा भी स्वच्छता दीदी है. 12वीं तक पढ़ी लिखी शिरोमणि पहले गांव में रहती थी. पति की मृत्यु साल 2009 में हुई. उसके बाद अंबिकापुर आ गई. साल 2015 से एसएलआरएम सेंटर में काम कर रही है. पहले विवेकानंद बालक छात्रावास में 7 साल काम किया. उसके बाद एसएलआरएम सेंटर में काम करने की ट्रेनिंग ली और तब से यहीं काम कर रही है.

शिरोमणि की एक बेटी है. जो 18 साल की है और प्राइवेट कॉलेज में पढ़ती है. शिरोमणि आगे भी पढ़ना चाहती थी लेकिन नहीं पढ़ सकी लिहाजा अब पूरा ध्यान बच्ची की पढ़ाई पर दे रही है ताकि बेटी अच्छे से पढ़ लें और अपने पैरों पर खड़ी हो जाए. शिरमणि कहती है कि यदि उनके पास एसएलआरएम की नौकरी नहीं रहती तो मजदूरी करके भी वह अपनी बेटी को पढ़ाती. एसएलआरएम से जीवन आसान हुआ है.

एक मंथ किराए रोकती हूं तो दूसरे मंथ बच्ची के लिए फीस जमा हो जाती है. इसी तरह एडजेस्ट करते हुए मैनेज करती हूं. खाने में भी थोड़ा कम खर्च करना पड़ता है- शिरोमणि केरकेट्टा, स्वच्छता दीदी

“सुरक्षित माहौल में महिलाएं करती है काम”

सुनीता सार्केल एसएलआरएम सेंटर में इंचार्ज के पद पर काम कर रही है. घरेलू समस्याओं के कारण पति से अलग हो चुकी है. 17 साल का एक बेटा है. साल 2015 से एसएलआरएम में काम कर रही है. सुनीता बताती है कि यहां से मिलने वाले वेतन से अपने बच्चे का पालन पोषण कर रही है. सुनीता कहती है कि यहां काम करने से ना सिर्फ पैसा मिल रहा है बल्कि सम्मान भी मिल रहा है. यहां ऐसी कई महिलाएं काम कर रही है जिनके पति नहीं है या फिर वह पति से अलग होकर अकेली अपना जीवन जी रही है.

यहां महिलाओं पर कोई दबाव नहीं है, क्योंकि उनके इंचार्ज भी महिलाएं ही है तो कभी कोई कुछ बोल भी दे तो बुरा नहीं लगता. महिलाएं यहां सुबह 7 बजे से आ जाती है और शाम 5 बजे तक सुरक्षित वातावरण में रहती है- सुनीता सार्केल, सुपरवाइजर

कचरा उठाकर बच्चों को पढ़ा रही सरिता

सरिता कुजूर कचरा उठाती है. वह 10 साल से एसएलआरएम सेंटर में काम कर रही है. पति की एक्सीडेंट में मौत हो गई तो दो बच्चों के पालन पोषण की जिम्मेदारी सरिता पर आ गई. यहां काम कर मिलने वाले पैसे से दोनों बच्चों को हॉस्टल में भर्ती कराया और खुद एसएलआरएम सेंटर में रहती है. वो कहती है कि आज जिंदगी बेहतर है.

कचरा उठाने से लेकर सुपरवाइजर, कैश कलेक्शन, इंचार्ज का काम कर रही महिलाएं

एसएलआरएम सेंटर में कई ऐसी महिलाएं है जो बीते 10 या उससे ज्यादा सालों से काम कर रही है. शुरुआत भले ही इन्होंने कचरा उठाने से किया लेकिन उनमें से कई महिलाएं अब सुपरवाइजर, कैश कलेक्शन या इंचार्ज के रूप में काम कर रही है. इन स्वच्छता दीदियों ने मुश्किल दौर में भले ही पढ़ाई छोड़ दी लेकिन एसएलआरएम सेंटर से जुड़ने के बाद फिर से पढ़ाई शुरू की. कोई डिग्री कर चुका है तो कई ऐसी महिलाएं है जिन्होंने स्कूल की पढ़ाई पूरी की, और अब अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिला रही है.

साल 2014 में अंबिकापुर नगर निगम ने स्वच्छ भारत मिशन के तहत कचरा प्रबंधन का मॉडल शुरू किया. डोर टू डोर कचरा कलेक्शन और उनके निष्पादन के लिए महिलाओं को जोड़ा गया. जिसकी बदौलत कई महिलाओं को रोजगार मिला. इनमें वे महिलाएं ज्यादा थी जो अकेले रहती थी. कई के पति की मौत हो चुकी थी या फिर ऐसी महिलाएं जिनके पति ने उन्हें छोड़ दिया था.

अंबिकापुर नगर निगम में एसएलआरएम सेंटर में 480 महिलाओं को रोजगार

अंबिकापुर नगर निगम क्षेत्र में स्वच्छता के काम में 480 महिलाओं को रोजगार मिला हुआ है. ये महिलाएं लोगों के घरों से कचरा कलेक्शन का काम करती हैं, गीले और सूखे कचरे को अलग करती हैं और इसे बेचकर आमदनी करती हैं. हर महिला को प्रति महीने 8 हजार रुपये मानदेय और 3 हजार रुपये बोनस, यानी कुल 11 हजार रुपये मिलते हैं.