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बंदरगाहों पर फंसे पड़े हैं साठ हजार टन बासमती चावल

निर्यातकों ने भारत सरकार से पहल और मदद की मांग की

राष्ट्रीय खबर

मुंबईः पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और अस्थिरता के कारण भारत का चावल निर्यात क्षेत्र एक गहरे संकट में घिर गया है। वर्तमान में लगभग 3,000 कंटेनरों में भरा 60,000 मीट्रिक टन बासमती चावल देश के विभिन्न बंदरगाहों पर फंसा हुआ है। इस गंभीर शिपिंग और लॉजिस्टिक्स व्यवधान को देखते हुए, भारतीय चावल निर्यातकों ने केंद्र सरकार से तत्काल हस्तक्षेप और सहायता की मांग की है।

भारत के कुल चावल निर्यात का लगभग आधा हिस्सा अफ्रीका और पश्चिम एशिया के देशों को जाता है। पश्चिम एशिया को होने वाला वार्षिक निर्यात लगभग 25,000 करोड़ रुपये का है, जिसमें 90 प्रतिशत हिस्सेदारी अकेले बासमती चावल की है। निर्यातकों के प्रमुख संगठन, इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन ने कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष को पत्र लिखकर मांग की है कि सरकार इस स्थिति को फोर्स मेज्योर (असाधारण परिस्थितियाँ) के रूप में मान्यता दे।

फोर्स मेज्योर का दर्जा मिलने से निर्यातकों को अनुबंध संबंधी कड़े नियमों से राहत मिलेगी। इससे विदेशी खरीदारों द्वारा जबरन कीमत कम करने, जुर्माना लगाने या ऑर्डर रद्द करने जैसे दबावों से बचने में मदद मिलेगी। साथ ही, बैंकों और बीमा कंपनियों के साथ बातचीत में भी निर्यातकों का पक्ष मजबूत होगा।

निर्यातकों के अनुसार, पश्चिम एशिया को होने वाले निर्यात में पिछले साल की तुलना में 30 प्रतिशत की गिरावट आई है। आमतौर पर रमजान के महीने से पहले और उसके दौरान मांग काफी बढ़ जाती है, लेकिन युद्ध के कारण अरब देशों के पूर्वी बंदरगाहों तक जहाज नहीं पहुंच पा रहे हैं। इस संकट ने लॉजिस्टिक्स खर्च को भी आसमान पर पहुंचा दिया है।

थोक माल ढुलाई में 20 फीसद की वृद्धि देखी गई है। कंटेनर माल ढुलाई में लगभग 40 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी हुई है। संगठन के उपाध्यक्ष देव गर्ग ने बताया कि निर्यातक इस भारी वित्तीय बोझ को उठाने में असमर्थ हैं। फेडरेशन ने सरकार से कुछ प्रमुख राहत उपायों की मांग की है। उनके मुताबिक बंदरगाह से संबंधित शुल्कों को माफ करना।

फंसे हुए माल को वापस लाने या दूसरे मार्ग पर भेजने के लिए सीमा शुल्क और आरबीआई  की ओर से दस्तावेजी सहायता। बैंकिंग सहायता के तहत एड-हॉक वर्किंग कैपिटल और ऋण विस्तार की सुविधा। हालांकि निर्यातक इस स्थिति को अस्थायी मान रहे हैं, लेकिन वर्तमान में बंदरगाहों पर फंसे हजारों कंटेनर भारतीय कृषि निर्यात के लिए एक बड़ी चुनौती बने हुए हैं।