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तकनीक के शोर में नैतिकता की गूँज और धूमिल होती साख

भारत इन दिनों वैश्विक पटल पर एक टेक सुपरपावर के रूप में उभरने की आकांक्षा रखता है। इंडिया एआई समिट जैसे आयोजन इसी दिशा में एक साहसिक कदम हैं, जिनका उद्देश्य दुनिया को यह दिखाना है कि भारत न केवल कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपभोक्ता है, बल्कि इसका नेतृत्व करने में भी सक्षम है। लेकिन जब ऐसे प्रतिष्ठित आयोजनों की चमक के पीछे प्रशासनिक कुप्रबंधन, सुरक्षा के नाम पर अभद्रता और गलगोटिया जैसे संस्थानों से जुड़े विवादों की छाया पड़ती है, तो सवाल केवल एक इवेंट की सफलता पर नहीं, बल्कि देश के अंतरराष्ट्रीय सम्मान पर भी उठता है।

एआई समिट का मूल उद्देश्य पारदर्शिता, सत्यता और भविष्य की तकनीक पर चर्चा करना था। विडंबना देखिए कि जहाँ दुनिया भर के प्रतिनिधि भविष्य की डीपफेक और भ्रामक जानकारी से लड़ने की बात कर रहे थे, वहीं एक प्रतिष्ठित संस्थान से जुड़े विवादों ने समिट की शुचिता पर सवाल खड़े कर दिए। गलगोटिया संस्थान से जुड़े हालिया घटनाक्रम और वहां कथित फर्जीवाड़े की खबरों ने शैक्षणिक और तकनीकी जगत में एक नकारात्मक संदेश भेजा है।

जब देश का प्रतिनिधित्व करने वाले मंचों पर ऐसे संस्थान अपनी पैठ बनाते हैं जिन पर विश्वसनीयता का संकट हो, तो विदेशी निवेशकों और तकनीकी विशेषज्ञों के बीच भारत की छवि एक गंभीर राष्ट्र के बजाय एक जुगाड़ प्रधान राष्ट्र की बनने लगती है। शिक्षा और तकनीक की नींव सत्यता पर टिकी होती है; यदि आधार ही खोखला हो, तो उस पर खड़ी एआई की भव्य इमारत ढहने में देर नहीं लगती। समिट के दौरान सबसे विचलित करने वाली खबरें वहां आए आगंतुकों और तकनीक प्रेमियों के साथ हुए दुर्व्यवहार से जुड़ी हैं।

सुरक्षा व्यवस्था किसी भी अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा है, लेकिन सुरक्षा के नाम पर लोगों को जबरन हटाना और उनके साथ अपराधी जैसा व्यवहार करना निंदनीय है। एआई समिट में शामिल होने आए लोग कोई प्रदर्शनकारी नहीं, बल्कि वे छात्र, शोधकर्ता और उत्साही नागरिक थे जो भारत के डिजिटल भविष्य को देखने आए थे। इससे भी अधिक शर्मनाक पक्ष उपकरणों की चोरी और छीना-झपटी की शिकायतों का है।

डिजिटल इंडिया का सपना देखने वाले देश में, जहाँ हम ईज ऑफ डूइंग बिजनेस की बात करते हैं, वहां आए हुए मेहमानों के लैपटॉप, फोन या अन्य तकनीकी उपकरणों का सुरक्षित न होना प्रशासनिक विफलता का चरम है। यह केवल सामान की चोरी नहीं है, बल्कि उस विश्वास की चोरी है जो एक युवा पीढ़ी अपने तंत्र पर करती है।

जब विदेशी मीडिया या अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधि ऐसी घटनाओं के गवाह बनते हैं, तो वे भारत की एआई क्षमताओं के साथ-साथ यहाँ के कार्य-संस्कृति और बुनियादी ढांचे का भी मूल्यांकन करते हैं। सुरक्षा कर्मियों द्वारा की गई बदसलूकी और अव्यवस्था की खबरें सोशल मीडिया के माध्यम से पल भर में वैश्विक हो जाती हैं।

क्या हम दुनिया को यह बताना चाहते हैं कि हम तकनीक में तो आधुनिक हो रहे हैं, लेकिन हमारे व्यवहार और प्रबंधन का तरीका आज भी सामंती या अनियंत्रित है? सरकार और आयोजकों को यह समझना होगा कि बड़े बैनर और भव्य लाइटिंग से देश का सम्मान नहीं बढ़ता, बल्कि वह बढ़ता है एक सुरक्षित और सम्मानित वातावरण से।

संस्थानों की स्क्रीनिंग: भविष्य में होने वाले आयोजनों में शामिल होने वाले शैक्षणिक और निजी संस्थानों की साख की कड़ी जांच होनी चाहिए ताकि विवादित संस्थान देश की छवि धूमिल न करें। सुरक्षा कर्मियों को भीड़ नियंत्रण के साथ-साथ अतिथि सत्कार का प्रशिक्षण दिया जाना अनिवार्य है। चोरी हुए उपकरणों और बदसलूकी की घटनाओं की जांच होनी चाहिए और पीड़ितों को उचित मुआवजा व न्याय मिलना चाहिए।

भले ही चोरी गये सामान बरामद हो गये हैं पर चोरी तो हुई थी तो चोर की पहचान भी हो। इंडिया एआई समिट एक स्वर्णिम अवसर था, लेकिन गलगोटिया जैसे विवादों और प्रशासनिक कुप्रबंधन ने इस पर एक अमिट धब्बा लगा दिया है। यदि भारत वास्तव में एआई की दौड़ में विश्व गुरु बनना चाहता है, तो हमें केवल एल्गोरिदम सुधारने की ज़रूरत नहीं है, बल्कि अपनी नैतिकता, सुरक्षा तंत्र और सार्वजनिक व्यवहार को भी विश्वस्तरीय बनाना होगा।

तकनीक और तहजीब जब साथ चलेंगे, तभी देश का मस्तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऊंचा होगा। वरना सिर्फ इवेंट मैनेजमेंट से देश में भले ही माहौल बनता रहे इसका दूरगामी प्रभाव विदेश से आने वाले अतिथियों और कंपनियों पर कतई नहीं पड़ेगा क्योंकि वे शुद्ध व्यापारी हैं और गलगोटिया द्वारा चीनी रोबोट को अपना बताने की तरकीबों से कतई प्रभावित नहीं होते हैं। जरूरी है कि हम वास्तविकता के धरातल पर उतरकर सही काम करें। वरना जिस मकसद से ऐसे आयोजन किये जाते हैं, वह मकसद ही पूरा नहीं होगा। जमीनी स्तर पर खामियां देखकर विदेशी कंपनियां भारत में पूंजी निवेश की तरफ आकर्षित नहीं होंगी।