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राहुल का हमला और सतर्क भाजपा

एक स्वस्थ और क्रियाशील संसदीय लोकतंत्र की आधारशिला इस विचार पर टिकी होती है कि वैचारिक मतभेद होने के बावजूद राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी कभी व्यक्तिगत दुश्मन नहीं होते। भारत के संसदीय इतिहास में अटल बिहारी वाजपेयी, इंद्रजीत गुप्त और सोमनाथ चटर्जी जैसे दिग्गज नेताओं के उदाहरण भरे पड़े हैं, जो सदन के भीतर एक-दूसरे की नीतियों पर तीखे प्रहार करते थे, लेकिन सेंट्रल हॉल में बैठकर साथ में चाय भी पीते थे। किंतु, वर्तमान राजनीतिक परिवेश में यह गरिमामयी रेखा तेजी से धुंधली होती जा रही है।

आज के दौर में संवाद की जगह शत्रुता ने ले ली है। इस बदलते माहौल में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी सत्ता पक्ष यानी भारतीय जनता पार्टी के लिए एक ऐसी चुनौती और शख्सियत बनकर उभरे हैं, जिनसे जुड़ने या बात करने के बजाय भाजपा सांसद और मंत्री उनसे दूरी बनाए रखना ही अपने राजनीतिक भविष्य के लिए सुरक्षित समझते हैं।

राजनीतिक सतर्कता का यह दृश्य हाल ही में एक वायरल वीडियो के माध्यम से पूरे देश ने देखा। यह घटना उस समय की है जब संसद सत्र के दौरान राहुल गांधी सदन से बाहर निकले थे। उसी समय भाजपा के दो दिग्गज मंत्री—प्रल्हाद जोशी और अश्विनी वैष्णव—मीडिया के कैमरों के सामने राहुल गांधी द्वारा लगाए गए आरोपों का खंडन करने की तैयारी कर रहे थे।

जैसे ही राहुल गांधी ने उन्हें देखा, वे किसी औपचारिक प्रोटोकॉल की परवाह किए बिना सीधे मंत्रियों की ओर बढ़ गए। यह दृश्य किसी भी सामान्य लोकतंत्र के लिए सुखद हो सकता था, लेकिन वर्तमान भारतीय राजनीति के लिए यह असहज था। राहुल गांधी ने केंद्रीय मंत्री प्रल्हाद जोशी का हाथ थामने की कोशिश की और मजाकिया लहजे में कहा, आइए, इसे साथ मिलकर करते हैं। इस अचानक हुए व्यवहार से दोनों मंत्री पूरी तरह सकपका गए। बिना कोई जवाब दिए, दोनों मंत्री कैमरे के सामने से किसी अप्रिय स्थिति से बचने के लिए तुरंत पीछे हट गए। यह वीडियो सोशल मीडिया पर दूरी और डर के प्रतीक के रूप में तेजी से प्रसारित हुआ।

देखें वह वीडियो

भाजपा नेताओं की इस घबराहट का आधार पूरी तरह निराधार नहीं है। पिछले कुछ समय से राहुल गांधी का तेवर पहले से कहीं अधिक आक्रामक और रणनीतिक हो गया है। पिछले सप्ताह संसद में उन्होंने भारत-अमेरिका व्यापार सौदे को लेकर सरकार पर जो हमला बोला, उसने सत्ता पक्ष को रक्षात्मक होने पर मजबूर कर दिया।

उनके इस भाषण ने न केवल विपक्ष को एकजुट किया, बल्कि सरकार के भीतर भी हलचल पैदा कर दी। ऐसे में जब कोई विपक्षी नेता सीधे प्रधानमंत्री की नीति और नियत पर प्रहार कर रहा हो, तो सत्ता पक्ष का कोई भी सदस्य उनके साथ हंसी-मजाक करते हुए नहीं दिखना चाहता। राहुल गांधी के साथ भाजपा नेताओं की यह दूरी केवल व्यापार सौदे या नीतियों तक सीमित नहीं है। यह एक व्यवहारगत पैटर्न बन चुका है।

कुछ समय पहले की एक अन्य घटना में, जब संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने औपचारिक रूप से राहुल गांधी की फिटनेस और उनके ऊर्जा स्तर के बारे में पूछा था, तो राहुल ने उसे एक व्यक्तिगत स्तर पर ले जाते हुए रिजिजू को सार्वजनिक रूप से अपने साथ वर्कआउट करने का न्योता दे दिया था।

भाजपा सदस्यों के भीतर यह डर घर कर गया है कि राहुल गांधी के साथ किसी भी तरह का मैत्रीपूर्ण व्यवहार, बातचीत या तस्वीर खिंचवाना उनके राजनीतिक करियर के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है। उन्हें डर है कि यदि उनकी कोई तस्वीर राहुल गांधी के साथ मुस्कुराते हुए वायरल हो गई, तो इसे पार्टी नेतृत्व के प्रति उनकी नरमी या वफादारी में कमी के तौर पर देखा जा सकता है।

आज के सोशल मीडिया के युग में, जहां हर सेकंड की गतिविधि पर आलाकमान और समर्थकों की नजर होती है, कोई भी सांसद ऐसा जोखिम उठाने को तैयार नहीं है। जैसे-जैसे राहुल गांधी प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार की नीतियों पर अपने प्रहार तेज कर रहे हैं, भाजपा सांसदों में उनसे दूरी बनाने की प्रवृत्ति और भी गहरी होती जा रही है।

यह स्थिति न केवल व्यक्तिगत संबंधों को प्रभावित कर रही है, बल्कि संसदीय कार्यवाही के सुचारू संचालन में भी बाधा बन रही है। जब सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच अनौपचारिक संवाद के रास्ते बंद हो जाते हैं, तो सदन के भीतर गतिरोध बढ़ना तय है। अंततः, यह केवल एक नेता से दूरी बनाने का मामला नहीं है, बल्कि उस संसदीय संस्कृति के क्षरण का संकेत है जहाँ मतभेद मनभेद में नहीं बदलते थे। भाजपा सांसदों की यह सावधानी यह बताती है कि आज की राजनीति में निजी संबंधों की तुलना में राजनीतिक धारणा और कट्टर वफादारी कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।