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एक लाख लोगों की सोच से कृत्रिम बुद्धिमत्ता आगे निकली

एआई बनाम इंसान में रचनात्मकता की महाजंग का परिणाम

  • औसत इंसान इनसे बुरी तरह पिछड़ा

  • दस प्रतिशत लोग आगे निकल गये

  • यह असली दिमाग का विकल्प नहीं

राष्ट्रीय खबर

रांचीः क्या चैटजीपीटी जैसे एआई सिस्टम वास्तव में मौलिक विचार पैदा कर सकते हैं? इस नए अध्ययन ने इसी सवाल का जवाब खोजने के लिए अब तक का सबसे बड़ा तुलनात्मक परीक्षण किया। शोधकर्ताओं ने 1,00,000 से अधिक इंसानों की तुलना जीपीटी-4, क्लॉड और जेमिनी जैसे दिग्गज एआई मॉडल्स से की। अध्ययन के नतीजे किसी को भी हैरान और थोड़ा असहज कर सकते हैं।

शोध में पाया गया कि एआई सिस्टम अब डाइवर्जेंट थिंकिंग (विविध और मौलिक विचार सोचने की क्षमता) में एक औसत इंसान को पीछे छोड़ चुके हैं। सरल शब्दों में कहें, तो एक आम आदमी जितना रचनात्मक सोच सकता है, एआई उससे कहीं बेहतर प्रदर्शन कर रहा है। भले ही एआई ने औसत इंसान को हरा दिया हो, लेकिन जब मुकाबला दुनिया के सबसे रचनात्मक 10 प्रतिशत लोगों से हुआ, तो एआई फीका पड़ गया। शोधकर्ताओं ने देखा कि एआई और सबसे प्रतिभाशाली इंसानों के बीच की खाई अभी भी बहुत बड़ी है। चोटी के रचनाकारों की मौलिकता और गहराई तक पहुंच पाना अभी भी मशीनों के बस की बात नहीं है।

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इस परीक्षण के लिए डाइवर्जेंट एसोसिएशन टास्क (डीएटी) का उपयोग किया गया। इसमें प्रतिभागियों को ऐसे 10 शब्द लिखने थे जिनका आपस में कोई संबंध न हो। उदाहरण के लिए, आकाशगंगा, कांटा, आजादी, शैवाल, हारमोनिका। यह कार्य सुनने में सरल लगता है, लेकिन यह मानसिक जटिलता और रचनात्मक समस्या समाधान की क्षमता को दर्शाता है।

इसके अलावा, कविता (हाइकु) और फिल्मों की पटकथा लिखने जैसे जटिल कार्यों में भी एआई और इंसानों को परखा गया। प्रोफेसर करीम जरबी का मानना है कि हमें इसे एक प्रतियोगिता के रूप में देखना बंद करना चाहिए। उनके अनुसार, एआई रचनाकारों की जगह नहीं लेगा, बल्कि उनके सोचने और रचने के तरीके को पूरी तरह बदल देगा। एआई एक शक्तिशाली क्रिएटिव असिस्टेंट की तरह है जो इंसानों को नए रास्ते दिखा सकता है, लेकिन अंतिम कमान और असली चमक अभी भी इंसानी दिमाग के पास ही है।

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