किसानों की आशंकाओं का उत्तर कौन देगा
हाल ही में घोषित भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते ने भारतीय राजनीति और कृषि जगत में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। पिछले शनिवार को जब इस समझौते की रूपरेखा सामने आई, तो इसने एक पुराने और संवेदनशील सवाल को फिर से जीवित कर दिया: क्या मुक्त व्यापार की कीमत भारत का अन्नदाता चुकाएगा? राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शनों के आह्वान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि किसान संगठन इस समझौते को अपनी आजीविका के लिए एक बड़े खतरे के रूप में देख रहे हैं।
यह विवाद केवल सेब, सोयाबीन तेल या अनाज पर आयात शुल्क कम करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पारदर्शिता, भरोसे और भारतीय कृषि के भविष्य से जुड़ा हुआ है। किसान संगठनों का तर्क है कि अमेरिका जैसे विकसित देशों के साथ व्यापार समझौता करना एक असमान युद्ध जैसा है। अमेरिकी कृषि क्षेत्र को वहां की सरकार द्वारा अरबों डॉलर की भारी सब्सिडी दी जाती है। इसके विपरीत, भारत के अधिकांश किसान छोटे और सीमांत हैं, जिनके पास संसाधनों की कमी है।
जब बिना किसी सुरक्षा कवच के विदेशी उत्पाद भारतीय बाजारों में पहुंचेंगे, तो स्थानीय किसान कीमत के मामले में उनका मुकाबला नहीं कर पाएंगे। हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड के सेब उत्पादक विशेष रूप से चिंतित हैं। अमेरिकी सेबों पर आयात शुल्क कम होने से स्थानीय बाजारों में उनकी भरमार हो जाएगी, जिससे घरेलू सेबों की कीमतें गिर जाएंगी। यही स्थिति सोयाबीन उत्पादकों और डेयरी क्षेत्र की भी है। किसान यूनियनों का कहना है कि अतीत में न्यूजीलैंड और यूरोपीय संघ के साथ हुए समझौतों का अनुभव अच्छा नहीं रहा है।
उन समझौतों के बाद भारत में सस्ते आयात की बाढ़ आ गई थी, जिससे घरेलू उत्पादकों का मुनाफा बुरी तरह प्रभावित हुआ था। दूसरी ओर, केंद्र सरकार और केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल इस समझौते को भारत के आर्थिक विकास के लिए ऐतिहासिक बता रहे हैं। उन्होंने समझौते में न्यूनतम आयात मूल्य और कोटा-आधारित रियायतें शामिल की हैं। इसका मतलब है कि एक निश्चित सीमा से अधिक या एक निश्चित कीमत से कम पर विदेशी माल भारत में प्रवेश नहीं कर पाएगा।
शुल्क में कटौती अचानक नहीं, बल्कि चरणबद्ध तरीके से की जाएगी, ताकि घरेलू उद्योगों को संभलने का मौका मिले। सरकार का मानना है कि इस समझौते से भारतीय किसानों के लिए अमेरिकी बाजारों के दरवाजे भी खुलेंगे, जिससे निर्यात को बढ़ावा मिलेगा। इस पूरे विवाद में सबसे बड़ा मुद्दा गोपनीयता का है। विपक्षी दलों, कई राज्य सरकारों और किसान संगठनों ने मांग की है कि इस व्यापार समझौते के प्रत्येक विवरण को संसद के पटल पर रखा जाना चाहिए।
उनका तर्क है कि जिस तरह पूर्व के कृषि कानून किसानों के जीवन को प्रभावित करते हैं, उसी तरह अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौते भी उनकी किस्मत तय करते हैं। पारदर्शिता की कमी के कारण यह धारणा बलवती हो रही है कि सरकार ने कॉर्पोरेट हितों या भू-राजनीतिक दबाव के आगे कृषि हितों की बलि चढ़ा दी है। हाल ही में संसद में विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा सरकार पर अमेरिकी चोकहोल्ड (दबाव) में होने का आरोप इसी अविश्वास की कड़ी का हिस्सा है।
भारतीय किसान पहले से ही कम आय, बढ़ती लागत और कर्ज के बोझ से दबा हुआ है। ऐसी स्थिति में, उचित घरेलू समर्थन—जैसे कि न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी, बेहतर बुनियादी ढांचा और जोखिम सुरक्षा—के बिना बाजारों को खोलना आत्मघाती साबित हो सकता है। व्यापार समझौते केवल कागजी दस्तावेज नहीं होते; वे उन लाखों परिवारों की थाली और खेत को प्रभावित करते हैं जो इस देश का पेट भरते हैं।
यदि सरकार को वास्तव में लगता है कि यह समझौता किसानों के हित में है, तो उसे बंद कमरों के बजाय संसद में इस पर बहस करनी चाहिए और किसानों के साथ सार्थक संवाद करना चाहिए। सुधारों का नैरेटिव तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक वह जमीनी स्तर पर उन लोगों की चिंताओं को दूर न करे जो इससे सीधे प्रभावित होने वाले हैं। भारत को अपनी कृषि स्वायत्तता और खाद्य सुरक्षा से समझौता किए बिना वैश्विक व्यापार में अपनी जगह बनानी होगी।
यदि इस समझौते में पारदर्शिता का अभाव रहा, तो यह एक और नीतिगत विफलता के रूप में दर्ज हो सकता है, जिससे किसानों और सरकार के बीच की खाई और गहरी होगी। इधर राजनीतिक परिस्थिति ऐसी बन गयी है कि नरेंद्र मोदी के अलावा किसी अन्य नेता या मंत्री की बातों पर जनता भरोसा ही नहीं कर पाती। यह मोदी सरकार ने खुद ही तैयार किया है, जहां पार्टी के तमाम नेता और मंत्री गौण हो चुके हैं। ऐसे में इधर उधर की बात करने के बदले नरेंद्र मोदी को किसानों के साथ सीधा संवाद करना चाहिए।