कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने अंतरिक्ष वैज्ञानिकों को सबसे अधिक हैरान किया
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तकनीक का नया मोड़, क्लाउड ए आई और स्वायत्तता
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खुद के भरोसे डेढ़ हजार फीट की दूरी तय कर ली
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एंथ्रोपिक क्लाउड मॉडल का उपयोग किया गया
राष्ट्रीय खबर
रांचीः ब्रह्मांड के रहस्यों को सुलझाने की दिशा में फरवरी 2026 एक ऐतिहासिक मील के पत्थर के रूप में दर्ज हो गया है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के पर्सवेरेंस रोवर ने मंगल ग्रह की पथरीली और चुनौतीपूर्ण सतह पर एक ऐसी कामयाबी हासिल की है, जिसने भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों की परिभाषा बदल दी है। पहली बार, इस छह पहियों वाले रोवर ने पूरी तरह से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किए गए मार्ग पर चलकर एक लंबी दूरी तय की है।
अब तक मंगल पर रोवर के चलने की प्रक्रिया काफी जटिल और समय लेने वाली थी। पृथ्वी से वैज्ञानिक मंगल की तस्वीरों का अध्ययन करते थे, पत्थरों और गड्ढों को चिह्नित करते थे और फिर रोवर के लिए एक-एक कदम तय करते थे। मंगल और पृथ्वी के बीच संचार में लगने वाले समय (लगभग 20 मिनट का विलंब) के कारण यह काम बहुत धीमा होता था।
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लेकिन इस बार, नासा ने एंथ्रोपिक के क्लाउड मॉडल का उपयोग करके रोवर के मार्ग की योजना बनाई। इस ए आई सिस्टम ने मार्स रिकोनिसेंस ऑर्बिटर से प्राप्त उच्च-रिज़ॉल्यूशन वाली तस्वीरों और ऊँचाई के डेटा का विश्लेषण किया। ए आई ने खुद ही खतरनाक चट्टानों, रेत के ढेरों और ढलानों की पहचान की और रोवर के लिए सबसे सुरक्षित रास्ता तैयार किया।
इस मिशन के दौरान, पर्सवेरेंस ने लगभग 456 मीटर (1,500 फीट) की दूरी बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के तय की। जेरो क्रेटर जैसे दुर्गम इलाके में, जहाँ कदम-कदम पर खतरा है, ए आई ने रोवर को बिल्कुल सटीक रास्ता दिखाया। नासा के वैज्ञानिकों ने इस डेटा को पहले डिजिटल ट्विन (रोवर का कंप्यूटर सिमुलेशन) पर परखा और पुष्टि होने के बाद ही मंगल पर निर्देश भेजे।
यह उपलब्धि केवल खुद चलने तक सीमित नहीं है। इसका असली महत्व खोज की गति में है। जब रोवर को हर छोटे मोड़ के लिए पृथ्वी के निर्देशों का इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा, तो वह कम समय में ज़्यादा दूरी तय कर सकेगा। इससे वैज्ञानिक उन क्षेत्रों तक भी पहुँच पाएंगे जो अब तक पहुँच से बाहर थे। नासा के प्रशासक जैरेड इसाकमैन के अनुसार, स्वायत्त तकनीकें भविष्य में चंद्रमा और मंगल पर मानव बस्तियों को बसाने और वहां रोबोटिक मदद पहुँचाने के लिए आधार का काम करेंगी।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब केवल धरती तक सीमित नहीं है; इसने लाल ग्रह पर भी अपनी बुद्धिमत्ता का लोहा मनवा लिया है। यह आने वाले समय में डीप स्पेस एक्सप्लोरेशन के लिए एक क्रांतिकारी बदलाव है।
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