नया मौसम उपग्रह प्रक्षेपण की तैयारी
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मौसम के खतरों की पूर्व सूचना देगा
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पूर्ण रूप से स्वदेशी तकनीक पर निर्मित
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आत्मनिर्भर भारत और वैश्विक प्रभाव
राष्ट्रीय खबर
चेन्नईः भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन एक बार फिर अंतरिक्ष की गहराइयों में भारत का परचम लहराने के लिए तैयार है। श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के दूसरे लॉन्च पैड से भारत के अत्याधुनिक नेक्स्ट जेनरेशन मौसम उपग्रह के प्रक्षेपण के लिए 12 घंटे की आधिकारिक उलटी गिनती शुरू हो गई है।
यह मिशन भारत के मौसम विज्ञान इतिहास में एक क्रांतिकारी मोड़ माना जा रहा है, क्योंकि यह मौजूदा उपग्रहों की तुलना में कई गुना अधिक सटीक और तीव्र डेटा प्रदान करने में सक्षम है। विशेष रूप से हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में उठने वाले चक्रवातों की निगरानी के लिए इसे भारत का सबसे शक्तिशाली आकाशीय नेत्र कहा जा रहा है।
इस उपग्रह की सबसे बड़ी विशेषता इसमें लगे उन्नत इमेजर और साउंडर पेलोड हैं। ये उपकरण न केवल बादलों की उच्च-रिजॉल्यूशन वाली तस्वीरें लेंगे, बल्कि वायुमंडल की विभिन्न परतों का ऊर्ध्वाधर विश्लेषण भी करेंगे। इससे वैज्ञानिकों को वायुमंडल में नमी, तापमान और हवा के दबाव में होने वाले सूक्ष्म परिवर्तनों को समझने में मदद मिलेगी।
इस डेटा के माध्यम से मानसून की भविष्यवाणी अब और भी सटीक होगी। इसके अलावा, यह उपग्रह अर्ली वार्निंग सिस्टम के रूप में कार्य करेगा, जो बिजली गिरने और अचानक आने वाली बाढ़ जैसी विनाशकारी आपदाओं की सूचना घंटों पहले दे सकेगा। यह तकनीक तटीय क्षेत्रों में रहने वाले मछुआरों और देश के करोड़ों किसानों के लिए एक जीवन रक्षक कवच साबित होगी।
इसरो प्रमुख के अनुसार, यह मिशन मेक इन इंडिया अभियान की एक बड़ी उपलब्धि है। उपग्रह के जटिल सेंसरों से लेकर प्रक्षेपण यान के क्रायोजेनिक इंजन तक, इसके अधिकांश महत्वपूर्ण हिस्सों को स्वदेशी तकनीक से डिजाइन और निर्मित किया गया है। यह मिशन न केवल भारत की आपदा प्रबंधन क्षमता को सुदृढ़ करेगा, बल्कि वैश्विक अंतरिक्ष बाजार में इसरो के वाणिज्यिक पोर्टफोलियो को भी नई मजबूती प्रदान करेगा।
प्रक्षेपण यान की सभी तकनीकी प्रणालियों, जैसे कि फ्यूल लोडिंग और नेविगेशन कंट्रोल, की अंतिम जांच पूरी कर ली गई है। मौसम विभाग ने भी प्रक्षेपण के समय को पूरी तरह अनुकूल बताया है। पूरी दुनिया की नजरें श्रीहरिकोटा पर टिकी हैं, क्योंकि इस सफल प्रक्षेपण के साथ ही भारत वैश्विक मौसम विज्ञान के क्षेत्र में एक अग्रणी शक्ति के रूप में अपनी स्थिति और मजबूत कर लेगा।