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मस्कट में ईरान और अमेरिका की वार्ता

कूटनीतिक मध्यस्थ के रूप में ओमान की भूमिका

मस्कटः ओमान की राजधानी मस्कट से आ रही यह खबर वैश्विक कूटनीति के गलियारों में एक नई हलचल पैदा कर रही है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव को कम करने के लिए मस्कट में शुरू हुई यह उच्च-स्तरीय गुप्त वार्ता केवल दो देशों का मामला नहीं, बल्कि वैश्विक शांति और सुरक्षा की दृष्टि से एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकती है।

ओमान लंबे समय से पश्चिम और खाड़ी देशों के बीच एक सेतु का कार्य करता रहा है। मस्कट की शांत और तटस्थ भूमि एक बार फिर उस समय गवाह बन रही है, जब दुनिया के दो सबसे कट्टर प्रतिद्वंद्वी आमने-सामने बैठे हैं। इस बैठक का आयोजन अत्यंत गोपनीयता के साथ किया गया है, ताकि बाहरी राजनीतिक दबाव और कट्टरपंथी गुटों के हस्तक्षेप से बचा जा सके। मस्कट में कूटनीतिक प्रतिनिधियों का जमावड़ा इस बात का संकेत है कि युद्ध की आहटों के बीच शांति की एक खिड़की अभी भी खुली है।

यह वार्ता ऐसे नाजुक मोड़ पर हो रही है जब मध्य पूर्व एक बारूद के ढेर पर बैठा नजर आ रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने ईरान के प्रति अधिकतम दबाव की नीति अपनाई हुई है। हाल के हफ्तों में वाशिंगटन से आए बयानों और खाड़ी में अमेरिकी सैन्य गतिविधियों ने यह संकेत दिया था कि अमेरिका किसी भी समय ईरान के परमाणु केंद्रों पर सैन्य कार्रवाई कर सकता है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय, विशेषकर यूरोपीय देश और संयुक्त राष्ट्र, इस संभावित टकराव को रोकने के लिए ओमान की मध्यस्थता की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं।

वार्ता की मेज पर दोनों पक्षों के पास मांगों की एक लंबी सूची है, जो दशकों पुराने अविश्वास की नींव पर टिकी है। अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का प्राथमिक उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ईरान कभी भी परमाणु हथियार विकसित न कर सके। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने यूरेनियम संवर्धन के स्तर को तत्काल प्रभाव से कम करे और उन सेंट्रीफ्यूज को नष्ट करे जो उच्च-स्तरीय संवर्धन में सक्षम हैं। इसके अलावा, अमेरिका की एक प्रमुख शर्त यह भी है कि अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के निरीक्षकों को बिना किसी पूर्व सूचना के ईरान की तमाम संवेदनशील और सैन्य साइटों के निरीक्षण की अनुमति मिले।

ईरान की चुनौतियाँ और मांग: ईरान का रुख भी काफी सख्त है। ईरान का तर्क है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है। ईरान के प्रतिनिधियों ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक उनकी अर्थव्यवस्था को पंगु बनाने वाले कड़े आर्थिक प्रतिबंध पूरी तरह नहीं हटाए जाते, तब तक वे किसी भी स्थायी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे। तेल निर्यात पर लगे प्रतिबंधों ने ईरान की मुद्रा और आम जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है, जिससे देश के भीतर भी सरकार पर दबाव बढ़ रहा है।