Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
Indo MIM IPO: इंडो एमआईएम का 3812 करोड़ का आईपीओ 23 जुलाई से खुलेगा, जानें प्राइस बैंड और पूरी डिटेल Dishani Chakraborty Boyfriend: मिथुन चक्रवर्ती की बेटी दिशानी का ब्राइडल लुक वायरल, खूबसूरती देख दीव... Kids Constipation Remedies: बच्चों में कब्ज की समस्या दूर करेंगे ये 5 फल, पेट साफ होना होगा आसान Kidney Cancer Symptoms: सिर्फ दर्द ही नहीं, शरीर के ये 7 संकेत भी हो सकते हैं किडनी कैंसर का इशारा SpiceJet Acquisition: स्पाइसजेट को खरीदेगी गल्फ एयरलाइन? निवेश और अधिग्रहण को लेकर शुरुआती बातचीत शु... China Floods: चीन के 1 लाख बांध बने मुसीबत, बिना चेतावनी पानी छोड़ने से कई गांवों में भारी तबाही Nepal Coin Map Controversy: नेपाल ने 1 रुपये के सिक्के से हटाया विवादित नक्शा, अब होगी बौद्ध मठ की त... वर्फीले प्रदेश में सोना उगल रहा है माउंट एरेबस, देखें वीडियो Zohran Mamdani on Netanyahu: क्या अमेरिका में गिरफ्तार होंगे नेतन्याहू? न्यूयॉर्क के मेयर के बयान पर... Campa Cola Market Share: रिलायंस 'कैंपा' ने कोल्ड ड्रिंक बाजार में मचाया तहलका, पेप्सी और कोका-कोला ...

झारखंड में फिर फंसेगी डीजीपी की गाड़ी

यूपीएससी को कार्रवाई की अनुमति से बदलेगा समीकरण

  • अनुराग गुप्ता का मामला भी फंसा था

  • अब यूपीएसकी के पास कानूनी हथियार

  • तीन वरीय अफसर पहले से मौजूद हैं

राष्ट्रीय खबर

रांचीः झारखंड में पुलिस महानिदेशक की नियुक्ति का मामला एक बार फिर कानूनी और प्रशासनिक विवादों के घेरे में आ गया है। हाल ही में हेमंत सोरेन सरकार द्वारा तदाशा मिश्रा को राज्य की नई डीजीपी नियुक्त किए जाने के बाद यह संकट गहरा गया है। इस नियुक्ति ने न केवल प्रशासनिक गलियारों में हलचल पैदा की है, बल्कि संघ लोक सेवा आयोग के कड़े रुख ने राज्य सरकार की मुश्किलों को और बढ़ा दिया है।

झारखंड सरकार का यह फैसला इसलिए विवादों में है क्योंकि तदाशा मिश्रा (1994 बैच) को जिम्मेदारी सौंपते समय विभाग में मौजूद तीन अत्यंत वरिष्ठ अधिकारियों की अनदेखी की गई। वर्तमान में अनिल पाल्टा (1990 बैच), प्रशांत सिंह (1992 बैच) और एम.एस. भाटिया (1993 बैच) जैसे वरिष्ठ अधिकारी मौजूद हैं, जो वरीयता क्रम में तदाशा मिश्रा से ऊपर हैं और डीजी रैंक पर कार्यरत हैं।

यह पहली बार नहीं है जब सोरेन सरकार ने ऐसा चौंकाने वाला कदम उठाया है; इससे पहले अनुराग गुप्ता को भी इसी तरह डीजीपी बनाया गया था, जिस पर भारी विवाद हुआ था। जानकार मानते हैं कि मुख्यमंत्री की ब्यूरोक्रेसी को लेकर यह शॉक ट्रीटमेंट की नीति भविष्य में भारी पड़ सकती है।

इस मामले को नई दिशा सुप्रीम कोर्ट के उस हालिया रुख से मिली है, जिसमें अदालत ने राज्यों द्वारा डीजीपी की नियुक्तियों में देरी करने और तदर्थ डीजीपी तैनात करने की प्रवृत्ति पर गहरी नाराजगी जताई है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि कई राज्यों में कार्यवाहक डीजीपी साल-दर-साल सेवा दे रहे हैं, जो सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन है। कोर्ट ने अब यूपीएससी को यह अधिकार दे दिया है कि वह राज्यों को अनुपालन के लिए रिमाइंडर भेजे और आदेश न मानने पर अवमानना की कार्यवाही शुरू करे।

सुप्रीम कोर्ट ने प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ (2018) मामले का हवाला देते हुए दोहराया कि राज्यों को डीजीपी की सेवानिवृत्ति से कम से कम तीन महीने पहले यूपीएससी को पात्र अधिकारियों के नाम भेजने चाहिए। आयोग इन नामों में से तीन वरिष्ठतम और अनुभवी अधिकारियों का एक पैनल तैयार करता है, जिनमें से किसी एक को राज्य सरकार को ‘तत्काल’ नियुक्त करना होता है। डीजीपी के लिए न्यूनतम दो वर्ष का कार्यकाल भी अनिवार्य किया गया है।

झारखंड के संदर्भ में, तदाशा मिश्रा की नियुक्ति इन मानदंडों पर खरी उतरती है या नहीं, यह यूपीएससी की अगली कार्रवाई पर निर्भर करेगा। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या हेमंत सोरेन अपने चिर-परिचित अंदाज में कोई नया चौंकाने वाला निर्णय लेते हैं या फिर नियमों के अनुरूप वरिष्ठता का सम्मान करते हैं।